मुरादाबाद : खुले में चिकित्सा अपशिष्ट फेंकने से संक्रमण का खतरा

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Edited By Amrit Vichar
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जिला अस्पताल में कचरा खा रहे थे कुत्ते, अंदर भी लेकर पहुंचा, कई निजी क्लीनिक एनजीटी के आदेशों की कर रहे अनदेखी

मुरादाबाद,अमृत विचार। बायो मेडिकल वेस्ट (चिकित्सा अपशिष्ट) यानी अस्पतालों से निकलने वाला कचड़ा। इसको लेकर स्वास्थ्य विभाग लापरवाह है। इसकी बानगी जिला अस्पताल में शनिवार को दिखी। प्लास्टिक कचरा, डिस्पोजेबल, ट्यूबिंग, नली सहित अन्य कचरा कुत्ते खा रहा थे।

चिकित्सा अपशिष्ट लेकर कुत्ता अस्पताल के अंदर भी चला गया। शायद, जिम्मेदारों की इस ओर नजर नहीं गई। जानकार मानते हैं कि ऐसी स्थिति से संक्रामण बढ़ने का खतरा बढ़ेगा, जबकि, दो माह पहले भी इमरजेंसी में कुत्तों के घूमने का वीडियो वायरल हुआ था। उसमें कुत्ता मरीज का रखा पानी पीता दिखा था, जबकि अस्पताल से निकलने वाले कचरे के निस्तारण के लिए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने मानक तय किए हैं। इसके बावजूद जिले के अधिकांश सरकारी व निजी अस्पतालों में इसका पालन नहीं हो रहा है। 

जिला अस्पताल से निकलने वाला कूड़ा इमरजेंसी के पास इकठ्ठा किया जाता है। इसमें, अधिकतर कबाड़ी प्लास्टिक की वस्तुएं उठा ले जाते हैं। ऐसा करने वाले मास्क भी नहीं पहनते हैं। सूत्रों का कहना है कि इसी रास्ते से अस्पताल के अधिकारी गुजरते हैं लेकिन, इनकी नजर इस पर नहीं पड़ती है। यह कबाड़ी अपनी जान जोखिम में डालकर खतरनाक चिकित्सा अपशिष्ट को अपने बोरे में भरते हैं और दुकान पर बेच देते हैं। चिकित्सकों का कहना है कि इस बीच उसके कई लोग संपर्क में रहते हैं जिन्हें संक्रामक बीमारी का खतरा बना रहता है।

सरकारी और निजी अस्पताल के लिए है नियम
अस्पतालों से निकलने वाले चिकित्सा अपशिष्ट का निस्तारण बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट में होना चाहिए। यह नियम सरकारी और निजी दोनों ही अस्पतालों में लागू है। निजी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन कराने से पहले अस्पताल संचालक को बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट से किए गए करार के कागजातों को शामिल करना होता है। मगर, यहां बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण को लेकर जिम्मेदार गंभीर नहीं हैं। इस वजह से निजी नर्सिंग होम संचालक प्लांट तक कचरा भेजने में आने वाला खर्च बचाने के चक्कर में इसका निस्तारण नहीं कराते हैं तो जिला अस्पताल में भी कचरा निस्तारण के नाम पर खेल चल रहा है।

कूड़ेदान को लेकर यह है शर्त
पीले कूड़ेदान में इसमें शारीरिक, रासायनिक, गंदा कपड़ा, दवाइयों संबंधित एवं प्रयोगशाला का कचरा डाला जाता है। लाल कूड़ेदान में दूषित प्लास्टिक कचरा, डिस्पोजेबुल वस्तुएं जैसे ट्यूबिंग, प्लास्टिक की बोतल, शिरभ्यंतर और कैथेटर, सुई के बिना सीरिंज आदि को रखा जाता है। नीले कूड़ादान में कांच की वस्तुएं एवं धातु प्रत्यारोपण, कांच से बनी टूटी-फूटी एवं शीशी अथवा बोतल, स्लाइड कांच की पेट्री डिश आदि को रखा जाता है। ग्रे कूड़ादान में धारदार धातु वाला कचरा, सुई एवं ब्लेड जैसे वस्तुएं रखी जाती हैं। काले कूड़ेदान में परिसंकटमय और अन्य कचरा, खाली एवं एक्सपायर्ड कीटाणुनाशक पदार्थों की बोतल, सीएफएल बल्ब, ट्यूब लाइट एवं बैटरी को रखा जाता है। आसमानी रंग के कूड़ादान में पुनर्चक्रण योग्य कचरा और हरे कूड़ेदान में स्वाभाविक तरीके से सड़ने वाले सामान्य कचरा को रखना होता है।

कहीं उचित प्रबंध नहीं, कहीं है डस्टबिन की व्यवस्था
बिलारी। क्षेत्र के निजी अस्पतालों और क्लीनिकों में चिकित्सा अपशिष्ट निस्तारण के लिए उचित प्रबंध नहीं हैं। हालांकि कुछ निजी अस्पतालों में डस्टबिन रखे गए हैं। शाहबाद चौराहा के पास स्थित मलिक हॉस्पिटल में शनिवार को अपशिष्ट निस्तारण के लिए डस्टबिन रखे मिले। लेकिन स्टेशन रोड स्थित निजी क्लीनिक में डस्टबिन में गंदगी मिली। मलिक हॉस्पिटल के डॉ. शाकिर मालिक ने बताया कि वे तीन प्रकार के डस्टबिन इस्तेमाल करते हैं। गीला कचरा, सूखा कचरा, पॉलीथिन नीडल के लिए अलग-असग डस्टबिन की व्यवस्था है। सुशीला बायोमेडिकल बेस्ट प्लांट की एक गाड़ी आती है, उसमें चिकित्सा अपशिष्ट डाल दिया जाता है। उन्होंने बताया इसकी लिखित कार्रवाई होती है और एक रसीद भी दी जाती है। इसके अलावाी जगत क्लीनिक में कोई डस्टबिन नहीं मिला। इसके डॉ. गुरदीप सिंह ने बताया कि सप्ताह में एक बार गाड़ी आती है, उसमें चिकित्सा अपशिष्ट डाला जाता है।

जिला अस्पताल में चिकित्सा अपशिष्ट को लेकर लापरवाही करने पर चिकित्साधीक्षक से पूछताछ की जाएगी। पूरे जनपद के लिए डॉ. आरिफ को बायो मेडिकल वेस्ट का नोडल अधिकारी बनाया गया है। कहीं कमी पाई जाती है तो उसकी जांचकर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। - डॉ. कुलदीप सिंह, सीएमओ

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