हश्र-ए-बंदूक: हजारों पड़ी हैं... पांच सौ रुपये में कोई भी ले जाओ

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एक जमाने की शान थीं, अब नाम भी मिटने की कगार पर, हर दुकान पर सैकड़ों का स्टॉक मगर कोई खरीदार नहीं

अनुपम सिंह/बरेली, अमृत विचार। वक्त की चक्की में एक और जो बड़ा नाम मिटने के करीब पहुंच चुका है, वह बंदूक का है। कभी हाथ में आते ही अलग रोमांच पैदा करने वाली बंदूक को अब कोई पूछने वाला नहीं है। वे लोग भी नहीं, जिन्होंने दसियों साल पहले अपनी बंदूक शस्त्रों की दुकानों पर जमा की थी और फिर उसे भूल गए। हालत यह है कि एक-एक शस्त्र की दुकान पर सैकड़ों नई-पुरानी बंदूकों का ढेर पड़ा हुआ है, लेकिन उनका कोई खरीदार नहीं है। शस्त्र दुकानदारों का कहना है कि वे पांच सौ रुपये में भी बंदूक बेचने को तैयार हैं लेकिन कोई खरीदने तो आए।

पिछले दो दशक में ही बंदूक की कद्र किस कदर मिट्टी में मिल गई है, इसकी मिसाल शस्त्रों की हर दुकान पर मौजूद है। शहर में शस्त्रों की 14 दुकानें हैं और इसके अलावा एक-एक दुकान आंवला और फरीदपुर में है। हर दुकान पर सैकड़ों बंदूकें बरसों से जैसी की तैसी पड़ी हैं। इनमें ज्यादातर बंदूकें ऐसी हैं जिन्हें लाइसेंसधारकों ने खुद जमा किया और फिर लेने नहीं आए। इसके अलावा नई बंदूकों का भी स्टॉक है जो बिका नहीं। शस्त्र दुकानदारों के मुताबिक कोई दुकान ऐसी नहीं है, जिस पर दो-चार सौ बंदूकों का स्टॉक न पड़ा हो। इनमें कुछ चार-पांच साल से पड़ी हैं तो कुछ 15 से 20 साल तक पुरानी हैं। जिले की सभी दुकानों में कुल मिलाकर पांच हजार से ज्यादा बंदूकों का स्टॉक होने का अनुमान है।

शस्त्र विक्रेता समिति के अध्यक्ष गुरजीत सिंह बिंद्रा बताते हैं कि उनकी दुकान में ढाई सौ से तीन सौ बंदूकें है। कई साल से न कोई बंदूक बिकी है न कोई बंदूक जमा करने वाला उसे वापस लेने आया है। अगर कोई पांच सौ रुपये में भी बंदूक खरीदने को तैयार हो तो उन्हें बेचने में कोई हिचकिचाहट नहीं होगी लेकिन कोई ग्राहक ही नहीं है।

नए लाइसेंस न बनाए जाने और आधुनिक असलहों के क्रेज ने की बंदूक की दुर्दशा
उत्तर प्रदेश में करीब 10 साल से नए शस्त्र लाइसेंस जारी करने पर रोक लगी हुई है। शस्त्र विक्रेताओं का कहना है कि बंदूकों की सबसे ज्यादा दुर्दशा इसी नीति की वजह से हुई है। लोग काफी समय तक चाहकर भी बंदूक नहीं खरीद पाए। नए लाइसेंस बंद होने से पहले ही आधुनिक और छोटे असलहों का क्रेज भी शुरू हो गया था, उसका भी असर बंदूकों की खरीद पर पड़ा। बता दें कि अक्टूबर 2018 में योगी सरकार ने लाइसेंस पर रोक हटाने की घोषणा की थी। इसके बाद प्रदेश भर में लाखों आवेदन भी हुए लेकिन लाइसेंस जारी होने की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही दोबारा रोक लगा दी गई।

कीमत से कई गुना ज्यादा हो गया किराया
कई दुकानों पर 20-20 साल से बंदूकें जमा हैं और उनका किराया उनकी कीमत से भी ज्यादा हो चुका है। शस्त्र दुकानदार कहते हैं कि एक यह भी वजह है कि लोग अपनी बंदूक वापस लेने नहीं आ रहे हैं। उनकी दिक्कत यह है कि वे न तो इन बंदूकों का किसी और ढंग से निस्तारण कर सकते हैं और न ही लोगों को बंदूक वापस लेने के लिए बाध्य कर पा रहे हैं।

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