क्रूरता बन सकती है वैवाहिक संबंधों के अंत का कारण : हाई कोर्ट
प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि एक बार क्रूरता साबित हो जाने पर वैवाहिक संबंध को बहाल करने का कोई औचित्य नहीं बनता है। क्रूरता के कार्य छिटपुट या एकल नहीं होते हैं, जिस पर आगे विचार करने की आवश्यकता हो। उक्त आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति शिव शंकर प्रसाद की खंडपीठ ने हेमसिंह उर्फ टिंचू के द्वारा दाखिल की गई प्रथम अपील को खारिज करते हुए पारित किया।
मामले में अपीलकर्ता (पति) ने विपक्षी पत्नी की प्रार्थना पर शादी भंग करने के प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, इटावा के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। जिस पर विचार करते हुए कोर्ट ने पाया कि पत्नी ने पति द्वारा की गई क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद की मांग की है। पत्नी ने कोर्ट को बताया कि अपीलकर्ता पैसे की मांग करते हुए उसके साथ मारपीट करता था और पुलिस कांस्टेबल की सरकारी नौकरी छोड़ने के लिए उस पर दबाव बनाता था। यहां तक कि अपीलकर्ता के पिता ने भी अपीलकर्ता के खराब आचरण के कारण उसे अपनी वसीयत से बेदखल कर दिया।
अपीलकर्ता के बुरे चरित्र और आचरण की पुष्टि उसके करीबी रिश्तेदारों ने भी की। हालांकि पति ने यह तर्क दिया था कि दहेज आदि की मांग न करने पर शादी बहाल कर दी जाए, लेकिन कोर्ट ने विवाह जैसी पवित्र सामाजिक संस्था में हिंसा जैसे कृत्य को अक्षम्य मानते हुए पति की याचिका खारिज कर दी।
