पीलीभीत: जंगल की लांघी हदें...छह टाइगरों को मिली उम्रकैद की सजा, जानिए पूरा मामला
14 टाइगर किए जा चुके हैं रेस्क्यू, छह लखनऊ कानपुर के चिड़ियाघरों में कैद
पीलीभीत, अमृत विचार: पीलीभीत टाइगर रिजर्व ने जिन बाघों की बदौलत ग्लोबल अवार्ड जीतकर अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी साख बनाई, आज उन्हीं बाघों को जंगल ही हदें लांघने पर उम्र भर के लिए सलाखों के पीछे रहने की सजा काटनी पड़ रही है। टाइगर रिजर्व बनने के बाद रेस्क्यू किए गए छह बाघ लखनऊ और कानपुर के चिड़ियाघरों में कैद है।
आंकडों के मुताबिक टाइगर रिजर्व बनने के बाद से लेकर अब तक 13 बाघों को जंगल से बाहर निकलने पर रेस्क्यू किया जा चुका है। इसमें शामिल सात बाघ तो खुशनसीब निकले, जिन्हें दोबारा से जंगल की आवोहवा में सांस लेने का मौका मिल गया, लेकिन रेस्क्यू किए गए छह बाघ लखनऊ और कानपुर चिड़ियाघर में सलाखों के पीछे उम्र कैद की सजा भुगत रहे हैं। इन बाघों का कसूर सिर्फ इतना था कि इन्होंने जंगल की हदें पार कर दी थी।
वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट की मानें तो बाघ को पकड़ने के बाद मेडिकल परीक्षण और व्यवहार आदि परखने के लिए माह भर या उससे अधिक समय के लिए चिड़ियाघर में रखा जाता है। उसके बाद उन्हें जंगल में छोड़ा जाना चाहिए, मगर ऐसा न कर उन्हें परीक्षण के नाम पर ले जाकर हमेशा के लिए सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है। इधर, दो दिन पूर्व भी एक बाघिन को गांव अटकोना से रेस्क्यू किया गया है। फिलहाल यह बाघिन अभी माला रेंज में पिंजरे में कैद है।
अफसर इस बाघिन के ब्लड सैंपल की रिपोर्ट आने का इंतजार कर रहे हैं। इसके बाद ही तय हो सकेगा कि यह बाघिन जंगल की आवोहवा में सांस लेगी या फिर इसे भी सलाखों के पीछे जाना होगा। हांलाकि वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जनपद में रेस्क्यू सेंटर का निर्माण जल्द हो जाता, तो पीटीआर के बाघ चिड़ियाघरों में नही बल्कि जंगलों में होते। साल भर पहले शासन द्वारा जारी 4.72 करोड़ रुपये की पहली किस्त से पूरनपुर क्षेत्र के गोपालपुर के जंगल में रस्क्यू सेंटर बनाया जा रहा है। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले साल में रेस्क्यू सेंटर का निर्माण पूरा करा लिया जाएगा।
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