Ram Mandir Ayodhya: आर्य सभ्यता का केंद्र रहा कानपुर; भगवान राम से है पुराना नाता..जानें रोचक तथ्य...
कानपुर शहर से भगवान राम का पुराना रिश्ता है।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कही-अनकही कथाओं का कानपुर बड़ा केंद्र रहा। इसकी शुरुआत रघुकुल वंश के भगीरथ से होती है जो गंगा को पृथ्वी पर लाये थे।
कानपुर, अमृत विचार। मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कही-अनकही कथाओं का कानपुर बड़ा केंद्र रहा। इसकी शुरुआत रघुकुल वंश के भगीरथ से होती है जो गंगा को पृथ्वी पर लाये थे। फिर बिठूर में वाल्मीकि आश्रम, लव, कुश कथा का वृतांत मिलता है। भौगोलिक स्थिति के आधार पर जम्बूद्वीप के अन्तर्गत भरत खण्ड के उत्तरभाग आर्यावर्त प्रदेश के गंगा यमुना के अंतर्वेद ब्रह्मावर्त क्षेत्र मे स्थित कानपुर जहां ब्रह्मा ने यज्ञ किया और मनु शतरूपा ने सृष्टि विस्तार दिया ।
कानपुर के भूभाग में उत्तानपद एवं ध्रुव, ययाति और दैत्यराज बलि व वाणासुर की राजधानी रहा। यहीं पर शुक्राचार्य, अंगिरा, दुर्वासा, शृंगी, जमदग्नि, परशुराम आदि ऋषि और सप्तचिरंजीवी अश्वत्थमा, श्रवण कुमार, कर्ण और भीष्म पितामह तक की स्मृतियों को कानपुर संजोये हुए है। श्रीरामकथा के कुछ प्रसंग कानपुर से भी जुड़े हुए हैं।
भागीरथ के मार्गदर्शन में मां गंगा ने अनुगमन किया और कानपुर के भूभाग पर गंगा के साथ रघुवंशी भागीरथ भी यहीं से निकले थे। श्रीरामजन्म रहस्य का प्रसंग भी कानपुर से जुड़ा हुआ है। अवधनरेश दशरथ को संतति लाभ हेतु गुरू वशिष्ठ के मार्गदर्शन में जो पुत्रेष्टि यज्ञ के यजनकर्ता ऋषि श्रृंगी थे। कानपुर में गंगा के पार्श्व भाग में स्थित सैबसू ग्राम उनका स्थान बताया जाता है। ऋषि श्रृंगी काश्यप पुत्र विभांडक के पुत्र थे। एक बार अंग देश में अकाल पड़ा तो राजा रोमपाद ने ब्राह्मणो के निर्देशन पर श्रृंगी ऋषि को बुलाया।
ऋषि श्रृंग के चरण पड़ते ही अंग देश में जलवृष्टि हुई तब राजा रोमपाद ने अपनी दत्तक पुत्री शान्ता जो राजा दशरथ और कौशल्या की जनित पुत्री थी के साथ विवाह कर दिया। संस्कृत साहित्य के आद्य कवि महर्षि वाल्मीकि का जन्म बैलेरुद्रपुर माना जाता है। अग्निशर्मा मतांतर में रत्नाकर और फिर तपश्चर्या के बाद वाल्मीकि कहलाए।
कानपुर इतिहास समिति के महामंत्री इतिहासकार अनूप शुक्ल बताते हैं कि जब भगवती सीता का निर्वासन श्रीराम के आदेश पर हुआ तब लक्ष्मण जी गंगा तट के पार्श्वस्थ परिहर में सीता जी को छोड़ कर चले गये थे। ऋषिकुमारों को जब यहां सीता मिली तब वह गंगा पार कर ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में ले आए। ऋषि वाल्मीकि ने वनदेवी के रूप में आश्रम प्रवास कराया।
यहीं पर सीता जी ने लव और कुश को जन्म दिया। लवणासुर वध हेतु मथुरा जाते समय शत्रुघ्न ने वाल्मीकि आश्रम में रात्रि प्रवास किया उसी दिन लवकुश का जन्म हुआ था। यहीं पर राम के अश्वमेधयज्ञ का अश्व जब लवकुश ने पकड़ा तो लवकुश का हनुमान जी सहित सभी रामानुजों के साथ युद्ध हुआ श्रीराम सेना को हार गयी थी तब प्रभु राम बिठूर कानपुर के वाल्मीक आश्रम के पास युद्ध क्षेत्र में आना पड़ा यहीं युद्ध भूमि में पिता पुत्र का मिलन हुआ। वह स्थान रण+मेल = रमेल कहलाता है।
श्री राम ने वाल्मीकि आश्रम में जाकर सीता जी से वापस चलने का आग्रह किया तो सीता जी को वापस जाना स्वाभिमान के विरुद्ध लगा और वह धरती मां की गोद में चली गई। तुलसीदास से पूर्व मध्यकाल के लब्धप्रतिष्ठ कवि विद्यापति (१३६० - १४५०) ने ब्रह्मावर्त कानपुर में वाल्मीकि आश्रम और सीता सौरि का दर्शन किया था। इसका उल्लेख विद्यापति ने अपने संस्कृत ग्रन्थ भू परिक्रमण के द्वितीय अध्याय ब्रह्मावर्त विवरणम में किया है।
ग्रन्थ के मुताबिक बारह योजन में विस्तारित पांच पुरियो कर्णपुर, कल्याणपुर, चतुर्वेदपुर, खर्जरीपुर, लोलपुर है। विद्यापति सबसे पहले परिहार कानन (परिहर) पहुंचे और कालेश्वर का दर्शन किया। इसके बाद वाल्मीक आश्रम पहुंचे वहीं अहिल्या कूप देखा और पिलुकानन में सीता प्रसव स्थान सीता सौरि में पांच दिन प्रवास किया। यहीं पर कल्याणपुर के राजा ब्रह्मदत्त आकर मिले। विद्यापति ने स्वयंभू मनु और सरस्वती कुण्ड का भी ज़िक्र किया है।
