प्रयागराज: डिप्टी सीएम को हाईकोर्ट से मिली राहत, फर्जी दस्तावेजों के मामले में दाखिल याचिका हुई खारिज
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिना किसी ठोस कारण के याचिका दाखिल करने में देरी की माफी के लिए हुए आवेदन पर अपनी तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि कोर्ट बिना किसी ठोस कारण,औचित्य और प्रमाणित सामग्री के देरी की माफी के लिए आवेदन पर विचार करने और ऐसी देरी को माफ करने का इरादा नहीं रखती है।
हालांकि देरी की माफी के लिए किसी आवेदन पर निर्णय लेने से पहले कोर्ट देरी की अवधि पर कभी भी विचार नहीं करती है, बशर्ते आवेदन में उचित और प्रामाणिक आधारों का उल्लेख किया गया हो। विलंब माफी के लिए आवेदन करते समय अल्पज्ञ नागरिक द्वारा की गई गलती स्वीकार्य होती है, लेकिन किसी सम्मानित और जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा आकस्मिक, गैर जिम्मेदाराना और गैर-सतर्क रूप से कार्य करना स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
उक्त टिप्पणी न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकलपीठ ने दिवाकर नाथ त्रिपाठी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए की। वर्तमान मामले में संशोधन वादी/याची ने खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताया है। 327 दिनों के विलंब की माफी के लिए आवेदन और उसके समर्थन में दाखिल हलफनामे में उसने ऐसा कोई आधार नहीं दिया है, जिससे यह पता चल सके कि मामले को समझने में संशोधनवादी द्वारा गंभीरता बरती गई है।
देरी की माफी के आवेदन में कथन अस्पष्ट और अप्रमाणित हैं। याचिका में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रयागराज और किशोर न्याय बोर्ड के आदेशों सहित उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य द्वारा फर्जी दस्तावेजों के जरिए लाभ लेने के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने की अर्जी निरस्त करने के आदेश की वैधता को चुनौती दी गई है।
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