प्रयागराज : उचित कानूनी सलाह के अभाव में पारित हो रहे अवैध आदेश
प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण से जुड़े एक मामले पर सुनवाई के दौरान कहा कि उचित कानूनी सहायता के अभाव में अधिकारी गलत और अवैध आदेश पारित कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में पारित अपने आदेश को उलटते हुए नए आदेश पारित किए, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा खारिज किए गए आदेश का ही हवाला देते हुए नए आदेश पारित किया जा रहे हैं, यह स्थिति गंभीर है। कोर्ट ने इस संदर्भ में चिंता जताते हुए कहा कि अगर यही स्थिति जारी रही तो भविष्य में राज्य पर भारी जुर्माना लगाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।
कोर्ट का मानना है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण तथा अन्य गंभीर मामलों में आदेश पारित करने वाले सचिवों को उचित कानूनी सहायता दी जानी चाहिए। इस उद्देश्य के लिए राज्य के पास कुशल अधिवक्ताओं का एक पैनल होना चाहिए। उक्त टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की खंडपीठ ने अब्दुल रहमान उर्फ नन्नी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए पारित किया।इस आदेश की एक प्रति सचिव (गृह) उत्तर प्रदेश सरकार को अग्रेषित करने का निर्देश दिया गया है।
दरअसल याची को प्रारंभिक निरोध आदेश की तिथि से 3 महीने की अवधि के लिए हिरासत में रखने का निर्देश दिया गया था। 3 महीने की समाप्ति के बाद याची की हिरासत अवैध हो जाती है। मौजूदा मामले में निरोध आदेश को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व पारित आदेश के आधार पर राज्य सरकार द्वारा विस्तारित किया गया, जिसे याची के अधिवक्ता ने अवैध करार दिया। अंत में कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 की धारा 12(1) के प्रावधानों के संदर्भ में माना कि निरोध आदेश को बढ़ाने का आदेश बिना किसी कानूनी अधिकार के पारित किया गया है, जो बरकरार रखने योग्य नहीं है।
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