वेश्यावृत्ति और अनैतिक तस्करी के मामले में आरोपी को High Court से मिली राहत
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वेश्यावृत्ति और अनैतिक तस्करी के मामले में आरोपी को निरपराध मानते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अगर कोई व्यक्ति वेश्यालय में आता है तो उसे अधिक से अधिक अपनी वासना को संतुष्ट करने के लिए वेश्या का खरीदार कहा जा सकता है। किसी महिला के साथ संबंध बनाने के लिए उसे मोल लेने का यह मतलब नहीं कि उसने महिला को वेश्यावृत्ति के लिए खरीदा और प्रेरित किया है।
वेश्यालय में ग्राहक के रूप में किसी व्यक्ति की केवल उपस्थिति अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 की धारा 3,4,5,7,8,9 के तहत अपराध को आकर्षित नहीं करती है। उक्त टिप्पणी न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने आरोपी द्वारा उक्त अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज मामले को निरस्त करने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
दरअसल याची को एक घर की तलाशी के दौरान रंगे हाथों पकड़ा गया था, जिसे वेश्यालय के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था, इसलिए उसके खिलाफ उक्त अधिनियम की धाराओं के तहत अपराध बना। हालांकि याची की अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याची केवल ग्राहक है और वह घर में केवल ग्राहक होने के नाते गया था। उस पर उक्त अधिनियम के तहत कार्यवाही और जुर्माना तब तक नहीं लगाया जा सकता, जब तक कि वेश्यावृत्ति में उसकी भागीदारी सिद्ध ना हो।
अंत में कोर्ट ने गुजरात कर्नाटक और आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वेश्यावृत्ति का मतलब व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए यौन शोषण या दुरुपयोग है। वेश्यालय में किसी व्यक्ति द्वारा किसी महिला के लिए अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि हेतु पैसे देने मात्र से उसे उक्त अधिनियम की धाराओं के तहत अपराधी नहीं माना जाएगा।
