हाईकोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के तहत झूठी शिकायत करने वाली महिला प्रोफेसर पर लगाया 5 लाख का जुर्माना
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एससी/ एसटी एक्ट के तहत दर्ज एक मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि शताब्दियों तक भारतीय समाज ने जीवन के दो आधार मूल्यों सत्य और अहिंसा का पोषण किया है। हमारे महापुरुषों ने भी इन मूल्यों को अपने दैनिक जीवन में अपनाने के लिए लोगों का मार्गदर्शन किया है। सत्य न्याय वितरण प्रणाली का एक अभिन्न अंग था।
एक समय लोग परिणामों की परवाह किए बिना अदालतों में सच बोलने में गर्व महसूस करते थे, लेकिन समय के साथ पुराने लोकाचार खत्म होते गए और व्यक्तिगत लाभ की भूख इतनी तीव्र हो गई कि मुकदमेबाजी में शामिल लोग अदालत ही कार्यवाही में झूठ, गलतबयानी और तथ्यों को दबाने में संकोच नहीं कर रहे हैं। उक्त टिप्पणी न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की एकलपीठ ने आईपीसी और एससी/एसटी अधिनियम की धाराओं के तहत दर्ज मामले में चल रही कार्यवाही और आरोप पत्र रद्द करने की मांग लेकर दाखिल याचिका को स्वीकार करते हुए की।
दरअसल इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को अपनी सहायक महिला प्रोफेसर को कक्षाएं लेने और ठीक से पढ़ाने के लिए सलाह देना भारी पड़ा। उन्होंने अपनी इस गलती के लिए लगभग 8 वर्षों तक मुकदमे का सामना किया। तथ्यों का अवलोकन करने पर कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता एक सुशिक्षित महिला है और कानून के प्रावधानों को अच्छी तरह से जानती है, इसलिए उसने व्यक्तिगत लाभ के लिए कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग किया।
शिकायतकर्ता ने याची और उनके सहयोगियों पर आरोप लगाया कि उन्होंने उसके खिलाफ जातिसूचक और अमर्यादित शब्दों का प्रयोग किया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि वर्तमान मामला केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से दर्ज कराया गया है। इस प्रकार की कष्टप्रद कार्यवाही को जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। शिकायतकर्ता की झूठी शिकायत के कारण याची और उनके सहयोगियों को सार्वजनिक छवि, प्रतिष्ठा और वित्तीय क्षति हुई है। इस कारण शिकायतकर्ता पर पांच लाख का जुर्माना लगाना आवश्यक है।
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