compassionate appointment पर हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला, कहा- देरी के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति का दावा करना गलत
कोर्ट ने याचिकाकर्ता का दावा किया खारिज
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से संबंधित एक मामले का निस्तारण करते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का दायरा तत्काल वित्तीय संकट से निपटने के लिए माना गया है। परिवार के कमाऊ सदस्य की मृत्यु के बाद आर्थिक संकट झेल रहे परिवार को उबारने के लिए सरकार की ओर से अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान किया गया है।
यह सत्य है कि संबंधित नियमों में संशोधन के अनुसार मृतक का पोता अनुकंपा नियुक्ति का हकदार है, लेकिन तत्कालिकता के प्रश्न पर सुनिश्चित सीमा अवधि बीत जाने पर ऐसी नियुक्ति के लिए दावे पर विचार नहीं किया जा सकता है। मामले के अनुसार याची की दादी श्रीमती मृदुला पांडेय की वर्ष 2012 में नौकरी के दौरान मृत्यु हो गई थी।
याची के अधिवक्ता का कहना है कि उसके पिता चिकित्सकीय रूप से स्वस्थ नहीं है, इसलिए संबंधित नियमों में संशोधन के आधार पर उनका पुत्र यानी मृतक का पोता अनुकंपा नियुक्ति का पात्र है। इस पर कोर्ट ने कहा कि दादी की मृत्यु वर्ष 2012 में हुई थी। मृत्यु के लगभग 6 साल बाद वर्ष 2017 में याची ने पहली बार अनुकंपा नियुक्ति के लिए दावा किया।
उसके बाद फिर 2023 में नियुक्ति के लिए अपना अभ्यावेदन प्रस्तुत किया। याची की ओर से नियुक्ति के लिए दावा करने में हुई एक दशक की देरी के विषय में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण भी प्रस्तुत नहीं किया गया, इसलिए याची को मांगी गई राहत ना देते हुए याचिका खारिज कर दी गई।
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