बरेली: पराली से खाद बनाकर मिट्टी की ताकत बढ़ा रहे विजय चौहान

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महिपाल गंगवार, बरेली। शासन और प्रशासन के लिए मुसीबत बनी पराली से खाद बनाकर खेत की ताकत बढ़ा रहे विजय चौहान आज युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं। इस तकनीक की सहायता से उन्होंने मिसाल पेश की है। पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में शोध के छात्र रहे विजय चौहान पुराने गीत गाने के साथ फोटोग्राफी …

महिपाल गंगवार, बरेली। शासन और प्रशासन के लिए मुसीबत बनी पराली से खाद बनाकर खेत की ताकत बढ़ा रहे विजय चौहान आज युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं। इस तकनीक की सहायता से उन्होंने मिसाल पेश की है। पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में शोध के छात्र रहे विजय चौहान पुराने गीत गाने के साथ फोटोग्राफी का भी शौक रखते हैं।

सिविल लाइंस निवासी जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाले 59 वर्षीय विजय चौहान की कहानी बड़ी दिलचस्प है। इनके पिता स्व. अजय पाल सिंह चौहान की पहचान आज तक प्रतिष्ठित एडवोकट के रूप में बरकरार हैं। आंवला के सिकरोड़ा में इनका करीब 450 बीघा का पैतृक फार्म है। आधे खेत में धान की फसल है। पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में शोध के दौरान उन्होंने प्लांट पैथोलॉजी के कई बड़े प्रोजेक्टों पर काम किए, साथ ही किसानों को प्रशिक्षित किया।

करीब 32 साल से वह खेती कर रहे हैं। पत्नी रजनी चौहान भी इसमें सहयोग करती हैं। इनकी हाईटेक किसानी से प्रभावित होकर तमाम किसान और कृषि छात्र उनके फार्म को देखने के लिए आते हैं। उन्होंने बताया कि धान के बचे अवशेष यानी पराली जलाने से वातावरण प्रदूषित होता है। इसे लेकर शासन व प्रशासन सख्त है। किसानों पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई की जा रही है, इसलिए किसान भाई पराली न जलाकर इससे खाद बनाने की प्रक्रिया अपनाएं। इसमें ज्यादा खर्च नहीं आता। खाद तैयार होने के बाद इसे खेतों में डालने से धरती की उर्वरा शक्ति बढ़ने के साथ फसल भी ज्यादा होगी।

पराली जलाने से नष्ट होता है यूरिया, डीएपी और पोटाश
विजय चौहान बताते हैं कि ज्यादातर किसान कंबाइन, हार्वेस्टर से फसल कटाई के बाद उसके अवशेष जलाना सबसे कम खर्चीला व प्रभावी तरीका मानते हैं। इसका दुष्प्रभाव फसल के साथ मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। सल्फर डाईऑक्साइड व नाइट्रोजन ऑक्साइड के कारण आंखों में जलन और चर्म रोग की शिकायत बढ़ जाती है।

कहा कि एक एकड़ धान की फसल में ढाई से तीन टन तक पराली की पैदावार होती है, जिसे जलाने से लगभग 32 किलो यूरिया, 5.5 किलो डीएपी और 51 किलो पोटाश जलकर राख हो जाती है। साथ ही कृषि के लिए सहायक कीट भी मर जाते हैं जिससे धरती की उपजाऊ शक्ति में भारी कमी आती है, इसलिये किसान सावधानी बरतें और नई तकनीक अपनायें।

बताया कि खाद बनाने के लिए स्ट्रा मल्चर यंत्र से पराली को महीन काटकर कुट्टी बना दी जाती है जो खेत में ही बिछी रह जाती है। इसके बाद खेत में पानी लगाकर ओठ आने पर खेत में 20 से 25 किलो प्रति एकड़ की दर से यूरिया बिखेर कर रोटावेटर या डिस्क हैरो का प्रयोग कर खेत को जोत देते हैं। इससे यही पराली सड़कर हरी (कार्बनिक) खाद बनकर खेतों की उर्वरा शक्ति को बढ़ा देती है।

दूसरे किसानों को कर रहे प्रेरित
विजय चौहान की पहचान बतौर कृषि विशेषज्ञ के रूप में है। आकाशवाणी के माध्यम से भी कई बार किसानों से संवाद किया। राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किसान सेमिनार में शामिल होने का भी कई बार अवसर मिला। स्वभाव आज भी इतना सरल है यदि कोई किसान उनके फार्म या शहर में सिविल लाइंस स्थित आवास पर पहुंचे तो वह विस्तारपूर्वक कृषि तकनीक जानकारी देने से पीछे नहीं हटते। इसके अलावा किसानों को प्ररित करने के लिए सोशल मीडिया समेत कई प्लेटफार्म का सहारा भी ले रहे हैं।

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