आधुनिकता की आपाधापी में विलुप्त हो रही गांव आंगन की होली, सदा अनंद रहे एही द्वारे मोहन खेलैं होरी हो...
अरुण कुमार मिश्र/गोंडा, अमृत विचार। क्षेत्र के कुछ गांवों में होली उत्सव को लेकर गांव- गांव में चौताल डेढ़ताल होली गीतों की धूम है। संस्मरण में कुछ गीत युवाओं को जरूर याद है पर जिस तरह पहले होली होती थी अब वह देखने को नहीं मिलता है। आधुनिक फूहड़ गीतों से सजे डीजे की धुन पर लोग होली तो जरूर खेलते हैं परंतु अवध में जिस तरीके से होली गीतों पर बुजुर्ग, महिलाएं व युवा थिरकते थे वह अब बहुत कम देखने को मिलती है।
बसंत ऋतु खत्म होते ही होली के गीत लोग गुनगुनाने लगते थे। लोकगीतों में सुमार चौताल, डेढ़ ताल, बारहमासी, धमार (फगुआ) और ऊपर से ढोलक की थाप से लोग झूम उठते थे। अवध मा होली खेलैं रघुवीरा अवध मा होली...इसी गीत से होली परवान चढ़ती थी और एक माह तक गांव के हर दरवाजे पर रात में महफिल जमती थी। इसके लिए पहले से दिन तय होता था कि किस दिन किसके दरवाजे पर कार्यक्रम होगा। उस दिन लोग बड़े चाव से पकवान, मिष्ठान व अन्य खाने की वस्तुएं लोगों को खिलाते थे और अबीर लगाकर होली के आगमन की बधाई देते थे।
होलिका दहन के दिन पूरी रात फगुआ गीतों की बयार चलती थी और रात में ही होलिका दहन भी किया जाता था। रात में चौताल(उतार चढ़ाव के चार ताल) शुरू होता था। मंदोदरि कहत पुकारी, हरि लायो है जनक दुलारी। अकिलिया है मारी..। ढोल, मजीरे व हारमोनियम की ताल पर लोग ठुमके लगाते थे। बीच-बीच में बारहमासा गीत भी होता था। बालम बंगलिनियां लुभाए, वहका बरहौ महिनवां रोवाए, गजब दुख ढाये..। डेढ़ ताल में भी खूब रस होता है। बेटा बिगड़ेव नंद बाबा का, मोहन मारैं डाका। घर से निकलब दुर्लभ होइगा दइया, नारि नई देखि गेछै कन्हैया...।

रविवार की रात परसपुर नगर के राजा टोला में आयोजित फ़ाग के राग कार्यक्रम में बड़े बुजुर्ग व बच्चों ने मिलकर जमकर होली गीत गायन किया। ढोल मजीरा की थाप पर होली गवैयों ने बारी- बारी एक से बढ़कर एक चौताल, डेढ़ताल, दोतल्ली, मतवाला होली गीत प्रस्तुत किया। अबीर गुलाल से सराबोर युवाओं ने देर रात तक होली गीत पर खूब मस्ती किया।
इस अवसर पर देव शंकर सिंह, विपिन सिंह, सचिन सिंह, आकाश सिंह, उदय सिंह, विशाल सिंह, राजू, शिवांश, सत्तू पाण्डेय, कमल किशोर सिंह, लल्ला सिंह समेत काफी संख्या में ग्रामीण शामिल रहे हैं। फ़ाग गवैया देव शंकर कुशवाहा ने बताया कि फागुन माह लगते ही घर- घर चौपाल में चौताल, डेढ़ताल का मधुर गीत गायन शुरू हो जाता है। फगुआ गीत गवैयों की टोली घर- घर पहुंच कर पारंपरिक गीतों को गाकर बुजुर्गों की विरासत को जीवित किये हुए हैं। दु
र्गा प्रसाद मौर्या ने बताया कि आधुनिक दौर में होली उत्सव में चौताल गायन की परंपरा अब विलुप्त सा हो रही है। फागुन मास प्रारंभ होते ही होली की तैयारी को लेकर पहले काफी उत्साह रहता था। अब आधुनिकता के आपाधापी भागदौड़ में होली उत्सव का प्यार स्नेह व भाईचारा भी विलुप्त होने के कगार पर दिख रहा है।
बुजुर्ग बताते हैं कि बड़े बुजुर्ग युवाओं की टोलियां घर- घर घूमकर चौताल डेढ़ताल होली में फाग गाने निकलती थी। सभी एक साथ बैठकर होली गीतों का आनंद लेते थे। अब डीजे के अश्लील गानों के चलते फ़ाग के राग व रंग भी प्रभावित हो रहे हैं। बड़े पैमाने पर ग्रामीण क्षेत्रों से युवा शहरों में पलायन होने से गाँव में होली गायन की परंपरा कम होती जा रही है। जिससे फाग गाने व ढोलक की थाप सुनने के लिए लोगों के कान तरस गए हैं।
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