Bareilly News: क्या लोग पार्टी को वोट देते हैं इसलिए बेपरवाह रहते हैं जनप्रतिनिधि?
बरेली, अमृत विचार। कोई जमाना था, जब चुनाव से पहले अच्छे प्रत्याशियों का चुनाव करने के लिए पार्टियों के छक्के छूट जाया करते थे। जनता की इच्छा के विरुद्ध प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारने में जोखिम रहता था लेकिन अब पार्टियां खुद घोषणा पत्र तैयार करती हैं और प्रत्याशी चुनते वक्त ज्यादा फोकस सिर्फ इस पर करती हैं कि क्षेत्र में जातिगत समीकरण क्या हैं।
लोगों का कहना है कि राजनीति में आए इस बदलाव की वजह से नेता जितना जोर पार्टी का टिकट लेने के लिए लगाते हैं, उतनी तत्परता से अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता के सुखदुख में शामिल नहीं होते। इसी वजह से स्थानीय स्तर की समस्याओं के निदान के लिए जनता को इधर-उधर दौड़ना पड़ता है। बरसों गुजरने के बाद भी उसकी छोटी-मोटी समस्याएं हल नहीं होतीं।
क्या बोली जनता
जनप्रतिनिधि की इच्छा से पार्टी कुछ करे या न करे लेकिन जो पार्टी कहेगी, वह उसे करना ही होगा। वैसे एक जनप्रतिनिधि को हमेशा जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। चाहे वह सत्तारूढ़ दल का सदस्य हो या न हो। तभी उसके दोबारा चुने जाने की गारंटी होती है।- धनपाल सिंह, बिथरीचैनपुर
एक अच्छे राजनीतिक दल का सत्ता में आना क्षेत्र की तस्वीर बदल सकता है। कोई भी जनप्रतिनिधि अपनी पार्टी की नीतियों के ही मुताबिक काम करता है। वह जनता के प्रति जवाबदेह रहता है या नहीं, यह भी इसी पर निर्भर करता है। पार्टी के किए वादों को उसे ही पूरा करना होता है। - बृजमोहन, भुता
मेरे लिए तो यही ज्यादा जरूरी है कि जनप्रतिनिधि अच्छा हो। हालांकि हमने अच्छा प्रतिनिधि चुना है और वह सत्तारूढ़ पार्टी से भी है, तभी इसका ज्यादा फायदा मिलता है। पार्टी अपने जनप्रतिनिधि से उसके कामों का हिसाब ले सकती है। सत्तारूढ़ पार्टी का अच्छा होना भी जरूरी है।-मंजू गुप्ता,चंद्रगुप्तपुरम
राजनीतिक दल का अच्छा होना जरूरी है। वोट देते वक्त इसका ध्यान रखना चाहिए। जनता का नजरिया बदल चुका है और प्रत्याशी अब दूसरी वरीयता पर आ गया है। हालांकि पहले अच्छा प्रत्याशी देखकर ही लोग वोट डालते थे। पार्टी के वादों को जनप्रतिनिधि ही पूरा कर सकता है। - मोहम्मद शाकिर, कांकर टोला
भारत के राजनीतिक परिवेश को देखा जाए तो कोई भी जनप्रतिनिधि जब किसी राजनीतिक दल से चुनकर आता है तो सबसे पहले उसकी जवाबदेही अपने दल के प्रति होती है। प्रत्येक पार्टी जनता के बीच कुछ चुनावी वादों के साथ आती है। यही चुनावी वादे जनप्रतिनिधि को मजबूर करते हैं कि वह जनता के प्रति जवाबदेह रहे और उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए संसद में प्रश्न उपस्थित करता रहे।
यदि लोगों की ओर से पार्टी के नाम पर भी वोट दिया जाता है, तब भी जनप्रतिनिधि का नैतिक दायित्व है कि वह जनता के प्रति जवाबदेह रहे। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो साफ है कि वह अपनी पार्टी ही नहीं संसद और जनता के लिए भी वफादार नहीं है। - डॉ. रमेश त्रिपाठी, प्रोफेसर राजनीतिक शास्त्र बरेली कॉलेज
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