Loksabha election 2024: सम्मेलनों में खाली कुर्सियां... प्रत्याशियों की हलक में जान
बरेली, अमृत विचार। प्रत्याशियों की जान हलक में अटकी हुई है, लेकिन जाने क्या वजह है कि हर चुनाव में जीजान से पसीना बहाने वाले कार्यकर्ता इस बार रूठे-रूठे घूम रहे हैं। सिर्फ उतना कर रहे हैं, जितने से उनकी गर्दन बची रहे। दो चरणों के चुनाव में मतदान कम रहने के बाद प्रत्याशी कार्यकर्ताओं में जोश पैदा करने के लिए सम्मेलन पर सम्मेलन बुलाई जा रहे हैं लेकिन उनमें भी भीड़ जुटाना भारी पड़ रहा है।
राजनीतिक दल कहने को अपनी तरफ से धुआंधार प्रचार कर रहे हैं लेकिन एक तरफ मतदाताओं की खामोशी नहीं टूट रही है तो दूसरी तरफ खुद उनके कार्यकर्ता पटरी पर आने को तैयार नहीं हैं। अलग-अलग जातियों और वर्गों के मतदाताओं को साधने के लिए सम्मेलन बुलाए जा रहे हैं लेकिन इन सम्मेलनों का अंजाम भी नहीं खास उम्मीद पैदा नहीं कर रहा है। अब तक हुए ज्यादातर सम्मेलनों में उम्मीद से आधी भी भीड़ न जुटने की वजह से प्रत्याशियों के खेमों की मायूसी और गहरी होती जा रही है।
करीब पांच सौ लोगों की बैठने की क्षमता वाले शहर के जिस हॉल में इस चुनाव के दौरान सबसे ज्यादा चुनावी सम्मेलन हुए हैं, वह अब तक एक बार भी पूरा नहीं भर पाया है। सम्मेलन के दौरान खाली कुर्सियां आयोजकों को मुंह चिढ़ाती रहती हैं लेकिन मजबूरी यह है कि चुनाव के दौर वे कोई प्रतिक्रिया भी व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं। पिछले दिनों इस हॉल में बिरादरी का सम्मेलन आयोजित किया गया था जिसमें उस समाज के लोग नहीं पहुंचे तो कई दूसरी जातियों के लोगों को भी बैठा लिया गया लेकिन फिर भी हॉल में तमाम कुर्सियां खाली रह गईं।
इसी हॉल में में हुए एक और वर्ग के सम्मेलन का भी यही अंजाम हुआ। इस वर्ग के ज्यादातर संगठनों ने कार्यक्रम से पहले अपने साथ 50-50 व्यापारियों को लाने का वादा किया था लेकिन सम्मेलन हुआ तो वे 10-10 व्यापारी भी नहीं ला पाए। सम्मेलन शुरू होने तक आधा हॉल खाली रहा। तय समय से काफी देर से पहुंचे मुख्य अतिथि भी खाली हॉल देखकर सन्न रह गए। कार्यकर्ताओं ने फोन करके कुछ आम लोगों को बुला लिया था। मुख्य अतिथि के सामने भी लोग बुलाए जाते रहे, लेकिन फिर भी हॉल भर नहीं पाया।
गेट पर हाथ जोड़कर खड़े हो गए- अभी मत जाओ
सम्मेलन के दौरान एक तो भीड़ नहीं थी, दूसरे मुख्य अतिथि काफी देर से आए। नतीजा यह हुआ कि सम्मेलन में आए लोगों ने मुख्य अतिथि के संबोधन से पहले ही लौटना शुरू कर दिया। इससे आयोजकों में और ज्यादा घबराहट फैल गई। मंच पर बैठे एक पदाधिकारी को वहां से उठकर गेट पर खड़ा होना पड़ा। वह हाथ जोड़कर बाहर निकल रहे लोगों से थोड़ा और रुकने का आग्रह कर उन्हें रोकते रहे।
कार्यकर्ता बोले- हमारे साथ तो सिर्फ दिखावा किया जा रहा है
राजनीतिक दलों की चुनावी गतिविधियों में उनके कार्यकर्ता हिस्सा तो ले रहे हैं लेकिन उनका जोश गायब है। मंगलवार को हुए एक सम्मेलन के दौरान कुछ कार्यकर्ताओं से बात की तो वे अपनी ही पार्टी की व्यवस्था से आहत दिखे। बोले, हम पुराने कार्यकर्ता हैं लेकिन हमारे साथ दिखावा किया जा रहा है। जो लोग चुनाव में वास्तविक मेहनत कर पसीना बहा रहे हैं, उन पर चुनाव प्रबंधकों का ध्यान नहीं है। एसी में बैठने वाले जो लोग कुछ देर के लिए धूप में आते हैं, उनके माथे का पसीना सबको दिखाई दे रहा है।
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