बरेली: क्रांति के 167 साल...दिल्ली से आया था गोपनीय संदेश, शिकस्त से घबरा गए हैं अंग्रेज

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बहादुर शाह जफर ने भेजा था बरेली के क्रांतिकारियों को संदेश

मोनिस खान, बरेली। मेरठ छावनी में हुई क्रांति की खबर वैसे तो चार दिन बाद बरेली में 14 मई को पहुंची, लेकिन सही वक्त आने तक बगावत की ज्वाला को बरेली के बागियों ने अपने सीने में ही दबाकर रखा। आखिरकार 31 मई को नवाब खान बहादुर खान की कयादत में अगले 11 महीने तक पूरे रुहेलखंड से कंपनी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए क्रांति का बिगुल फूंका गया।

इससे पहले नवाब खान बहादुर खान, सूबेदार बख्त खां और मुंशी शोभाराम ने बरेली छावनी के विशाल मैदान में जाकर बागी सैनिकों को पूरे देश में 1857 की क्रांति का नेतृत्व कर रहे आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर का गोपनीय संदेश पढ़कर सुनाया। जिसने क्रांतिकारियों में जोश भरने का काम किया।

बरेली कॉलेज इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष जोगा सिंह होठी ने अपनी किताब महाक्रांति नायक नवाब खान बहादुर खान में आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के पत्र का जिक्र किया है। खत का मजमून कुछ इस तरह है- "बरेली और मुरादाबाद की पलटनों के सेनापतियों का हार्दिक अभिनंदन आलिंगन। भाइयों! दिल्ली में अंग्रेजों के खिलाफ जंग हो रही है। खुदा की दुआ से हमने अंग्रेजों को जो पहली शिकस्त दी है, उससे वे घबरा गए हैं।

बेशुमार हिंदुस्तानी बहादुर दिल्ली में आकर जमा हो रहे हैं। ऐसे मौके पर अगर आप वहां खाना खा रहे हैं तो हाथ यहां आकर धोइये। आपका शहंशाह आपका इस्तकबाल करेगा और आपकी खिदमत का सिला देगा। हमारे कान इस तरह आपकी ओर लगे हुए हैं, जिस तरह रोजेदार के कान अजान देने वालों की पुकार की ओर लगे होते हैं।

आपके दीदार की प्यासी हमारी आंखें इसी तरह सड़क पर लगी हैं, जिस तरह कासिद की आंखें लगी रहती हैं। आइये! आपका फर्ज है कि फौरन आइये। हमारा घर आपका घर है। भाइयों! आइये बिना, आपकी आमद के बहार में गुलाब के फूल नहीं आ सकते। बिना बारिश के कली नहीं खिल सकती। बिना दूध के बच्चा जी नहीं सकता।"

31 मई 1857 को क्रांति के दिन कब क्या हुआ

-सुबह चार बजे कैप्टन ब्राउनली का बंगला जला दिया गया

-पूर्वाहन 11 बजे तोपखाना लाइन में क्रांति के आगाज को तोप छूटी

-शाम 4 बजे तक बरेली कॉलेज प्ररचार्य सी बक समेत कई अंग्रेज अफसरों की हत्या कर दी गई

-शाम 5 बजे तक बरेली पर क्रांतिकारियों का अधिकार हो गया

-देर शाम को हिंदू और मुसलमान भूड़ स्थित नवाब के आवास पर इकट्ठा हुए

-खान बहादुर खान को पूरे रुहेलखंड का नवाब घोषित किया गया

-1 जून को भूड़ स्थित आवास से जुलूस निकालने और ताजपोशी का एलान हुआ

गुमनामी में जी रहे नवाब के वंशज
1857 की क्रांति के 167 साल बीत चुके हैं लेकिन बरेली में क्रांति का नेतृत्व करने वाले शहीद-ए-आजम नवाब खान बहादुर खान के वंशज आज भी गुमनामी की जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। नवाब के वंशज लियाकत अली खान बताते हैं कि पहले तो खान बहादुर खान की मजार बदहाल थी लेकिन जबसे जेल के अंदर काम शुरू हुआ है तो मरम्मत आदि की गई है। वहीं अपने हालात सुनाते हुए वह कहते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का वंशज होने के नाते महज एक राशन की दुकान तीन साल पहले मिली थी। बेटी शगुफ्ता सरकारी राशन की दुकान चलाती हैं। जिसमें गुजारा भी नहीं हो पाता। दुकान पर महज 170 कार्ड हैं, जिसके कमीशन से दुकान का किराया निकालना भी मुश्किल हो जाता है।

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