बरेली: बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ जरूरी है उनका भावनात्मक स्वास्थ्य

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4 जून=आक्रामकता के शिकार मासूम बच्चों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस 2024

शब्या सिंह तोमर/बरेली। बच्चों का मन शीशे की तरह साफ होता है जैसा व्यवहार हम बच्चों से करते हैं वह उनके व्यक्तित्व निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। इसमें सबसे अधिक सक्रिय रोल माता पिता का होता है उसके बाद स्कूल का।यदि बच्चों के साथ जाने-अनजाने आक्रामक व्यवहार,अनावश्यक क्रोध व उनका उपहास उड़ाना,मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि वर्तमान समय में परिस्थितयां बदली हैं अब बच्चे ज्यादा संवेदनशील हो गए हैं जिनके साथ हमारा व्यवहार उनके इमोशनल सपोर्ट देने वाला होना चाहिए।बच्चों का जितना शारीरिक स्वास्थ,पढ़ाई लिखाई जरूरी है उतना ही जरूरी उनका भावनात्मक स्वास्थ्य भी है।

मंडलीय मनोवैज्ञानिक केंद्र की कांउसलर याशिका वर्मा ने बताया केंद्र में हर माह पूरे मंडल से बच्चों से संबंधित 54 मामले सामने आते हैं। जिसमें बच्चों के बरताव से माता पिता को शिकायत होती है,लेकिन काउंसलिंग के बाद कारण माता पिता का व्यवहार या स्कूली वातावरण में ही इसकी जड़ें देखने को मिलती हैं।

जिला अस्पताल की काउंसलर खुश अदा ने बताया अकसर उनके पास माता पिता बच्चों के न पढ़ने की शिकायत लेकर आते हैं लेकिन अपने व्यवहार का आंकलन नहीं करते। न ही बच्चे के साथ शांति से बातचीत और उसे समझने की कोशिश नहीं करते।

केस-1 
मंडलीय मनोवैज्ञानिक केंद्र में पिछले माह एक बीस वर्षीय युवक अपनी मां के साथ केंद्र में आया,जिसमें उसकी मां की शिकायत थी कि युवक अचानक से बहुत ज्यादा आक्रामक होकर बुरी तरह चिल्लाने लगता है,इस पर युवक से बाचतीच करने के बाद उसके बचपन की बातें सामने आयीं। जब युवक 12 वर्ष का था तब पिता के गुजर जाने के बाद चाचा-ताऊ शराब पीकर बुरी तरह चिल्लाते थे,जिससे वह सहम जाता था।यही आक्रामक व्यवहार अब उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया है।

केस -2 
जिला अस्पताल में माता पिता अपने 12 वर्षीय बच्चे की याद न करने की शिकायत लेकर पहुंचे,जहां पता चला कि बच्चा माता-पिता और स्कूल द्वारा बनाए गए जरूरत से ज्यादा सख्त माहोल की वजह से अवसाद में चला गया है,इसलिए उसका मन पढ़ने में नहीं लग रहा है।

केस-3
17 वर्षीय किशोर गुमसुम रहने लगा। काउंसलिंग में पता चला कि जब से वह बारह वर्ष का था तब से हर कोई उसकी लंबाई के लिए उसका मजाक बनाता था,माता-पिता ने भी कभी ध्यान ही नहीं दिया,ऐसे में बच्चा इन पांच सालों में बच्चे का आत्मविश्वास बहुत कम हो गया,जिससे न तो उसके कोई बाहर दोस्त हैं न ही स्कूल में।

कारण-

-माता-पिता के आपसी वाद-विवाद।
-बच्चों के साथ न बात करके उनका मजाक बनाना।
-स्कूल में अन्य बच्चों के द्बारा परेशान करना
-माता-पिता का अनावश्यक बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोपना
-बच्चों के सामने गलत ढंग या आक्रामता से बर्ताव करना।
पहचान
-बच्चे के सामान्य बर्ताव में अचानक बदलाव आ जाना
-बच्चे का अचानक चुप रहने लगना
-जब बच्चे की बात की जाए तो उसका चीजें अंदेखा करने लगना।
उपाय
-बच्चों के मन की बात जानने की कोशिश करें
-यदि उनसे गलती हो जाए तो उन्हें अलग-थलग करने की बजाए वजह जानें,खुद को उनकी जगह रखें।
-अपने बच्चे को विश्वास में लें कि वह बड़ी गलतियां स्वीकार करने से न पीछे हटे।
-एकल माता-पिता के लिए जरूरी है कि वह बच्चे की केवल आर्थिक जरूरत ही बनकर न रहें,उनका भावनात्मक पहलू भी जानने की कोशिश करें।

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