पर्यावरण के हित में

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Edited By Amrit Vichar
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दिल्ली में इस दिवाली पर भी पटाखे नहीं जलाए जाएंगे। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पटाखे जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। जाहिर है कि केजरीवाल ने यह फैसला पटाखों से होने वाले प्रदूषण पर रोकथाम के लिए उठाया है। पिछले साल भी दिवाली पर दिल्ली में पटाखे जलाने पर प्रतिबंध लगाया गया था और उसके …

दिल्ली में इस दिवाली पर भी पटाखे नहीं जलाए जाएंगे। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पटाखे जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। जाहिर है कि केजरीवाल ने यह फैसला पटाखों से होने वाले प्रदूषण पर रोकथाम के लिए उठाया है। पिछले साल भी दिवाली पर दिल्ली में पटाखे जलाने पर प्रतिबंध लगाया गया था और उसके अच्छे नतीजे भी देखने को मिले थे। दिवाली बाद होने वाले वायु प्रदूषण पर काफी हद तक रोकथाम हो सकी।

इस बार दिवाली ऐसे समय पर है जब दुनिया भर में कोरोना का कहर बरकरार है। ऐसे में, पहले से ही हम सब एक मुसीबत का सामना कर रहे हैं। अगर दिवाली पर पटाखे जलाए जाएंगे तो इससे होने वाला प्रदूषण दूसरी मुश्किलों के रूप में देखने को मिलेगा। वैसे भी दिल्ली और आसपास के इलाके में पराली जलाए जाने से हर साल प्रदूषण का संकट खड़ा हो जाता है।

यह ठंड के दिनों में फाग के रूप में देखने को मिलता है। समूची दिल्ली फाग से घिर जाती है और जनजीवन को बेहद मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में, दिल्ली में दिवाली पर पटाखे जलाने पर प्रतिबंधित पर्यावरण और जनहित में ही है। अलबत्ता, इस फैसले से पटाखा उद्योग को नुकसान होगा लेकिन इसके सकारात्मक प्रभाव जनजीवन और हमारे पर्यावरण पर होंगे तो ऐसे फैसले लेने में कोई बुराई नहीं।

यह किसी से छुपा नहीं है कि प्रदूषण किस हद तक घातक है। वैसे भी दिवाली उल्लास का प्रतीक है। जरूरी नहीं कि यह उल्लास पटाखे छोड़कर ही मनाया जाए। बेहतर हो कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान और बिहार समेत अन्य राज्य भी पटाखे न जलाने का दिल्ली जैसा प्रतिबंध लगाएं तो पूरे देश में भी प्रदूषण पर काफी हद तक काबू किया जा सकेगा। हालांकि आम जनता की भी यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह प्रदूषण के संकट को रोकने के लिए खुद भी पटाखे न जलाएं, क्योंकि यह किसी एक के नहीं सबके हित में है। वैसे भी, पटाखे न जलाने से हम सब बेवजह के खर्च से बच जाते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार पटाखों में बेहद खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। कॉपर, कैडियम, लेड, मैग्नेशियम, सोडियम, जिंक, नाइट्रेट और नाइट्राइट जैसे रसायन का मिश्रण करके पटाखे बनाए जाते हैं। इससे 125 डेसिबल से ज्यादा ध्वनि होती है जो किसी को भी कुछ पल के लिए बहरा कर देने के लिए काफी होती है। पटाखों से निकली चिंगारी से हर साल सैंकड़ों लोगों की आंखें और चेहरे जख्मी हो जाते हैं। सांस की बीमारी तो होती ही है। दमे के रोगियों की दिक्कत बढ़ जाती है। हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक का भी खतरा रहता है। कई बार नर्वस सिस्टम भी गड़बड़ा जाता है। पशु−पक्षियों के जीवन के लिए भी यह पटाखे खतरनाक होते हैं।