हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को लगाई फटकार, न्यायिक आदेशों के अनुपालन में कर रहे थे देरी

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों द्वारा समन तामील और न्यायिक आदेशों के क्रियान्वयन में देरी के मामले में कहा कि पुलिस अधिकारियों की उदासीनता और अक्षमता अनुचित देरी में योगदान देती है, जिससे पहले से ही लंबित मामलों की संख्या और बढ़ जाती है और न्याय के शीघ्र निपटान में गंभीर बाधा उत्पन्न होती है। कर्तव्य की यह लापरवाही न केवल कानूनी कार्यवाही को लंबा खींचती है बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के प्रभाव और अखंडता में जनता के विश्वास को भी खत्म करती है। उक्त आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने शानू सक्सेना और अन्य के मामले में सुनवाई के दौरान पारित किया। 

मामले के अनुसार आरोप पत्र निरस्त करने पर विपक्षियों को समन जारी किया गया, लेकिन कोर्ट के समक्ष उपस्थित सरकारी अधिवक्ता समन की तामील के संबंध में कुछ नहीं बता सके, इसलिए कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक, फतेहपुर को कोर्ट के समक्ष उपस्थित होकर यह बताने का निर्देश दिया कि कोर्ट के आदेश का अनुपालन क्यों नहीं किया जा रहा है। इसके अलावा कोर्ट ने यह भी देखा कि पुलिस अधीक्षक की ओर से दाखिल हलफनामा सरकारी अधिवक्ता द्वारा लिखा गया था, लेकिन उनके निजी सचिव ने हलफनामे के पहले भाग में नाम बदल दिया था। अभिलेखों के साथ जानबूझकर की गई इस छेड़छाड़ को अधिकार का अनुचित हस्तांतरण माना गया। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि सरकारी अधिवक्ता ने प्रासंगिक न्यायिक आदेशों को ध्यान में रखे बिना हलफनामा दाखिल किया था। जागरूकता की कमी के कारण हलफनामा अपर्याप्त रहा, जिससे न केवल अनुपालन में लापरवाही प्रदर्शित हुई बल्कि न्यायिक निर्देशों के प्रति भी चिंताजनक उपेक्षा प्रदर्शित होती है। 

कोर्ट ने अपनी विशिष्ट टिप्पणी में कहा कि सरकारी अधिवक्ता की भूमिका केवल प्रक्रियात्मक नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य भी है कि कानूनी कार्यवाही पूरी लगन और न्यायिक अनुपालन के साथ की जाए। जब ऐसा उच्च पदाधिकारी उचित प्रक्रिया के प्रति अवहेलनापूर्ण रवैया अपनाते हैं तो यह कानूनी प्रणाली में शामिल होने की इच्छा रखने वाले अन्य लोगों के लिए एक खतरनाक मिसाल बन जाती है। अंत में कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि सरकारी अधिवक्ता के निजी सचिव की भूमिका केवल लिपिकीय है। वह हलफनामे में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं कर सकता, जिससे न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता को नुकसान पहुंचे। कोर्ट ने ऐसी घटनाओं को आश्चर्यजनक और अत्यंत विचलित करने वाला माना। ऐसी घटनाएं न्यायिक प्राधिकरण और प्रक्रियात्मक अखंडता के प्रति घोर उपेक्षा को उजागर करती हैं। जिम्मेदार अधिकारियों की घोर लापरवाही न्याय प्रणाली की नींव पर प्रहार करती है। इस तरह का घोर दुराचार पूरी तरह से अक्षम्य है और भविष्य में ऐसी किसी भी पुनरावृत्ति को रोकने के लिए तत्काल, अडिग, सुधारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है। अंत में कोर्ट ने सरकारी अधिवक्ता को अगली सुनवाई पर बेहतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।

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