Bareilly: मानदेय में निपट जाती है ग्राम निधि... विकास क्या कराएं ?

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, अमृत विचार। गांवों के विकास के मुद्दे भाषणों में तो खूब गूंजते हैं लेकिन असल में हालात उलट हैं। राज्य वित्त से मिलने वाला पैसा इतना कम होता है कि तमाम ग्राम पंचायतों में प्रधान जरूरत के भी काम नहीं करा पा रहे हैं। कम आबादी वाली पंचायतें ज्यादा समस्याग्रस्त हैं। इन्हें मिलने वाला पैसा गोशाला और शौचालयों के केयरटेकरों को मानदेय देने में ही निपट जाता है।

ग्राम प्रधानों का कहना है कि गांव को विकसित करने के लिए जनसंख्या के अनुरूप राज्य और केंद्रीय वित्त से बजट मिलता है। इसके अलावा मनरेगा का भी बजट होता है। राज्य वित्त से हर माह औसतन 30 से 35 हजार रुपये की किस्त मिलती है जिसका ज्यादातर हिस्सा मानदेय देने में खर्च हो जाता है। ग्राम पंचायतों में हर महीने पंचायत सहायक, सामुदायिक शौचालय, गोशाला के केयर टेकरों को छह-छह हजार, ग्राम प्रधान को पांच हजार और सामुदायिक शौचालय की स्वच्छता किट पर तीन हजार खर्च होते हैं। ऐसे में नाली निर्माण, हैंडपंप की मरम्मत और रीबोर जैसे जरूरी विकास कार्य नहीं हो पा रहे हैं।

गांव की आबादी 1700 है। हर माह राज्य वित्त से औसतन 35 हजार रुपये मिलते हैं। इसमें पांच हजार मेरे मानदेय, शौचालय के केयरटेकर पर छह हजार, पंचायत सहायक पर छह हजार, शौचालय की स्वच्छता किट पर तीन हजार रुपये समेत 25 हजार यूं ही खर्च हो जाते हैं। गांव के विकास के लिए धनराशि नहीं बच पाती है। - तेजस यादव, ग्राम प्रधान, अठायन

अफसर ग्राम प्रधानों से चहुंमुखी विकास की अपेक्षा तो करते हैं लेकिन विकास कैसे होगा, इस पर ध्यान नहीं। गांव की ढाई हजार आबादी है। राज्य वित्त से हर माह सिर्फ 35 हजार आते हैं। इनमें गोशाला के केयर टेकरों पर 18 हजार, पांच हजार मेरे मानदेय, पंचायत सहायक आदि पर खर्च होते हैं। मनरेगा से ही कुछ और काम होते हैं।- हरदीप यादव, ग्राम प्रधान बहादुरपुर करोड़

गांव की दो हजार आबादी है। ग्राम निधि में हर माह 30 से 35 हजार रुपये मिलते हैं। इसमें से शौचालय के केयर टेकर, पंचायत सहायक, गोशाला के केयर टेकर, प्रधान के मानदेय पर ही 18 हजार खर्च हो जाते हैं। मनरेगा का भुगतान भी समय से नहीं होता। कम पैसा मिलने से गांव का विकास प्रभावित होता है।- विजेंद्र सिंह, प्रधान प्रतिनिधि, कंजा चकरपुर

छोटी ग्राम पंचायतों में विकास कराना चुनौतीपूर्ण है। राज्य वित्त की धनराशि मानदेय देने भर में खत्म हो जाती है। केंद्रीय वित्त के पैसे से भी नाली, इंटरलॉकिंग सड़क निर्माण, हैंडपंप मरम्मत या रीबोर के काम पूरे नहीं हो पाते हैं। फिर भी प्रधानों से विकास की गंगा बहाने की अपेक्षा की जाती है। संगठन शासन को पत्र भेज चुका है।- बुद्धपाल गंगवार, अध्यक्ष प्रधान संघ

 

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