बरेली: पेट की आग बुझाने को कर रहे मजबूरियों का सफर
बरेली,अमृत विचार। कोरोना संक्रमण फैलने पर दिल्ली एवं अन्य राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूरों में से कई ने पैदल घर तक की दूरी नापी थी तो कई लोग भूख से बेहाल होकर घर तक आने के साधन का इंतजार करते रहे। बरेली में आने वाले कई मजदूरों को जो तकलीफ मिली थी उसे ध्यान करके …
बरेली,अमृत विचार। कोरोना संक्रमण फैलने पर दिल्ली एवं अन्य राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूरों में से कई ने पैदल घर तक की दूरी नापी थी तो कई लोग भूख से बेहाल होकर घर तक आने के साधन का इंतजार करते रहे। बरेली में आने वाले कई मजदूरों को जो तकलीफ मिली थी उसे ध्यान करके तय किया था कि परदेस मजदूरी करने नहीं जाएंगे लेकिन अपने और परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी ने फिर से उन्हें परदेस जाने के लिए मजबूर कर दिया। हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर वापस हो गए।
ऐसा एक दृश्य मंगलवार को भी सेटेलाइट से पीलीभीत रोड पर देखने को मिला। सैकड़ों श्रमिकों को पैसे बचाने के लिए मजबूरी में कई किलोमीटरों का सफर पैदल ही तय करना पड़ रहा है। परेशान हाल लोगों ने कहा कि अब यहां काम है नहीं तो परदेस में जाकर ही काम तलाशना होगा।
कोरोना संक्रमण की वजह से जब पूरे देश में लाकडाउन हुआ तो श्रमिकों को रोजगार छिन गया। कंपनियों और ठेकेदारों ने श्रमिकों के पैसों में भी कटौती कर ली थी। इस रोजगार छिनने की श्रेणी में बरेली मंडल के 87 हजार 935 श्रमिक ऐसे थे जो जिन्होंने अपने घर की तरफ रुख किया। घर से दूर श्रमिकों के हालात बिगड़े तो उन्होंने अपने गांव की ओर रुख लिया। सवारियां नहीं मिली तो पैदल ही हजारों किलोमीटर का सफर तय कर दिया, मगर उनके हालात गांव में भी नहीं सुधर पाए। उनके पास कोई रोजगार ही नहीं बचा।
केंद्र और राज्य सरकार की सैकड़ों योजनाएं भी श्रमिकों का दर्द और बेरोजगारी खत्म नहीं कर सकी। कारण यह कि योजनाएं धरातल तक उतर ही नहीं पाई। इसी बीच राज्य सरकार ने श्रमिकों के लिए लेबर रिफॉर्म कानून के जरिए गांवों और कस्बों में ही रोजगार देने की योजना बनाई थी। श्रमिकों के लिए 20 लाख रोजगार मुहैया कराने के उद्देश्य से एक रोडमैप भी तैयार किया गया था। इससे किसानों को खुशी जरूर मिली। मगर उन योजनाओं को धरातल पर नहीं उतारा जा सका। इसकी वजह से उनके हालात भी नहीं सुधर सके। जब खाने पीने के लाले हुए तो उन्होंने फिर से पलायन शुरू कर दिया है।
मंगलवार को सेटेलाइट से पीलीभीत की ओर पैदल जाने वाले श्रमिकों की भीड़ दिखाई दी। उनका कहना था कि वह फतेहगंज पूर्वी से आ रहे है और पटना के लिए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि लाकडाउन में वह अपने घर यह सोचकर आए थे कि गांव में चलकर खेती किसानी से ही परिवार को पालेंगें मगर उससे परिवार को गुजारा नहीं हो पा रहा है। गांवों में अब कोई काम भी नहीं बचा है। कैसे अपने परिवार को चलाएंगे।
पटना में जाकर फैक्ट्रियों में ही करेंगे काम
श्रमिकों का कहना था कि लाकडाउन से पहले वह फैक्ट्रियों में वाटर टैंक आदि बनाने का कार्य करते थे। लाकडाउन में वहां से भागे थे। अब फिर से वहीं पर जाकर इसी कार्य को दोबारा से शुरू करेंगे। इसी बीच अन्य श्रमिकों ने बताया कि वह भी फैक्ट्रियों में काम करते थे। लाकडाउन में मालिकों ने पैसा जरूर काटा मगर अब रोजगार तो दे ही देंगे।
