हाईकोर्ट : निराधार व भ्रामक याचिकाएं दाखिल करने वाले अधिवक्ता को लगाई फटकार
प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आरोपी की तीसरी अग्रिम जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए न केवल याचिका को खारिज कर दिया, बल्कि आवेदक के अधिवक्ता की कार्यप्रणाली पर भी कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट का कहना है कि आवेदक के अधिवक्ता ने अपने मुवक्किल को उचित कानूनी परामर्श नहीं दिया और लगातार निराधार व भ्रामक याचिकाएं दाखिल कर न्यायालय का समय व्यर्थ किया।
कोर्ट ने याची के अधिवक्ता विकास चंद्र तिवारी के आचरण की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि इस प्रकार की लापरवाही न्यायिक व्यवस्था के लिए बाधक है। लगातार तीन अग्रिम जमानत याचिकाएं दाखिल करना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार-बार ऐसी अर्जी दाखिल करने से न्यायिक अनुशासन प्रभावित होता है और वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है। उक्त आदेश कृष्ण पहल की एकलपीठ ने संजीव कुमार उर्फ संजय की याचिका खारिज करते हुए पारित किया। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि आवेदक पिछले तीन वर्षों से ट्रायल कोर्ट से बचता रहा है। सुप्रीम कोर्ट के कारतरे और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1976) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि कोई व्यक्ति यदि कानून की प्रक्रिया से बचने के लिए छिपता है, चाहे वह अपने ही घर में क्यों न हो, तो वह कानून की नजर में 'फरार' माना जाएगा। दूसरी ओर सरकारी अधिवक्ता ने अग्रिम जमानत अर्जी का विरोध करते हुए कहा कि आवेदक का लंबा आपराधिक इतिहास है, जिसे ठीक से स्पष्ट नहीं किया गया। मामले के अनुसार याची ने अपने सह-आरोपियों राजपाल, नवनीत, भोला, स्वेता और शिवानी के साथ मिलकर 8 मार्च 2022 को शाम करीब 5 बजे शिकायतकर्ता पर हमला किया।
इस दौरान सह-आरोपी भोला ने गला दबाने का प्रयास किया और दूसरे सह-आरोपी राजपाल ने चाकू से वार किया, जिससे गंभीर चोटें आईं। इसके बाद याची के खिलाफ आईपीसी के विभिन्न धाराओं के तहत पुलिस स्टेशन सिविल लाइंस, मुरादाबाद में मामला दर्ज किया गया। कोर्ट ने पाया कि पहले की दो अग्रिम जमानत अर्जियां आरोपपत्र दाखिल होने से पहले दाखिल की गई थीं और उस समय गिरफ्तारी नहीं हुई थी, लेकिन आरोपपत्र दाखिल होने (01 अक्तूबर 2024) के बाद तीसरी अर्जी दाखिल करना न्याय प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग है, इसलिए कोर्ट ने अग्रिम जमानत देने से साफ इनकार कर दिया।
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