कैंसर से जंग में विज्ञान की नई छलांग!
कैंसर आज दुनिया की सबसे गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों में गिना जाता है। यह बीमारी हर साल लाखों लोगों को प्रभावित करती है और लाखों की जान ले लेती है। यह रोग शरीर की कोशिकाओं के अनियंत्रित विकास और प्रसार से होता है, जो स्वस्थ ऊतकों को नष्ट कर देती हैं और शरीर के अन्य भागों में मेटास्टेसिस (फैलाव) का कारण बनती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कैंसर वैश्विक मृत्यु दर का लगभग एक-छठा हिस्सा है। साल 2022 में दुनियाभर में लगभग 2 करोड़ नए मामले सामने आए और करीब 97 लाख लोगों की मौत हुई। अमेरिकन कैंसर सोसाइटी की 2025 रिपोर्ट के अनुसार, अकेले अमेरिका में 6.18 लाख लोग कैंसर के कारण अपनी जान खो सकते हैं।
ऐतिहासिक झलक
कैंसर का उल्लेख लगभग 2500 वर्ष पहले यूनानी चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स ने “कार्सिनोमा” कहकर किया था। भारत में प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में “अरबुद” और “ग्रंथि” जैसे शब्दों का प्रयोग मिलता है। 19 वीं शताब्दी में आधुनिक सर्जरी और माइक्रोस्कोपिक अध्ययन ने कैंसर को बेहतर ढंग से समझने का रास्ता खोला। 20 वीं शताब्दी में रेडिएशन, कीमोथेरेपी और बाद में इम्यूनोथेरेपी जैसी तकनीकों ने इलाज के नए रास्ते खोले और आज एमआरएनए वैक्सीन जैसी आधुनिक तकनीक इस इतिहास को एक नए अध्याय तक ले जाने का संकेत देती है।

वर्तमान उपचार और उनकी सीमाएं
आज कैंसर का इलाज मुख्य रूप से सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन, इम्यूनोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और हार्मोन थेरेपी पर आधारित है। सर्जरी में ट्यूमर को हटाया जाता है, जबकि कीमोथेरेपी दवाओं के जरिए कैंसर कोशिकाओं को मारती है। रेडिएशन उच्च ऊर्जा किरणों का उपयोग करता है। इम्यूनोथेरेपी शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय बनाती है। टार्गेटेड थेरेपी केवल कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाती है और हार्मोन थेरेपी हार्मोन-निर्भर कैंसर में काम आती है। इन सभी में सफलता की संभावना है, लेकिन इनसे जुड़े महंगे इलाज, दुष्प्रभाव और उपचार प्रतिरोध जैसी चुनौतियां भी हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक नई, अधिक सुरक्षित और असरदार विधियों की खोज में लगे हैं।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
वैश्विक स्तर पर अब तक 100 से अधिक कैंसर वैक्सीन क्लिनिकल ट्रायल्स चल रहे हैं, जिनका फोकस मुख्यतः फेफड़े, स्तन, प्रोस्टेट, मेलेनोमा, अग्नाशय और मस्तिष्क के कैंसर पर है। रूस की एंटरोमिक्स वैक्सीन इन प्रयासों में महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकती है, बशर्ते कि यह अगले चरणों के ट्रायल्स और अनुमोदन में भी सफल रहे।
कैंसर के प्रकार
कैंसर कई रूपों में सामने आता है। कार्सिनोमा सबसे आम है, जो त्वचा या अंगों को ढकने वाले ऊतक में शुरू होता है, जैसे स्तन, फेफड़े, प्रोस्टेट और कोलन कैंसर। सार्कोमा हड्डी और मांसपेशी जैसे संयोजी ऊतकों में विकसित होता है और अपेक्षाकृत दुर्लभ, लेकिन अत्यधिक आक्रामक होता है। ल्यूकेमिया रक्त कोशिकाओं का कैंसर है, जबकि लिंफोमा और मायलोमा प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित करते हैं। मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी का कैंसर सबसे जटिल माने जाते हैं। भारत में फेफड़े, स्तन, मुख और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर सबसे आम हैं।

एंटरोमिक्स: रूस से नई उम्मीद
सितंबर 2025 में रूस के वैज्ञानिकों ने घोषणा की कि उन्होंने एमआरएनए आधारित कैंसर वैक्सीन एंटरोमिक्स विकसित की है, जिसके प्रारंभिक ट्रायल में उल्लेखनीय सफलता दर्ज की गई। यह वैक्सीन रूसी स्वास्थ्य मंत्रालय की अंतिम अनुमोदन प्रक्रिया का इंतजार कर रही है। मीडिया खबरों के अनुसार एंटरोमिक्स चार गैर-हानिकारक वायरसों का उपयोग करती है, जो ट्यूमर को सीधे नष्ट करते हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय करते हैं। रूस के नेशनल मेडिकल रिसर्च रेडियोलॉजिकल सेंटर और एंगेलहार्ट इंस्टीट्यूट ऑफ मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के सहयोग से किए गए प्रारंभिक परीक्षणों में वैक्सीन सुरक्षित पाई गई और कई मामलों में ट्यूमर का आकार 60–80 प्रतिशत तक कम हुआ। फेडरल मेडिकल एंड बायोलॉजिकल एजेंसी की प्रमुख वेरोनिका स्कवोर्त्सोवा ने कहा कि यह परिणाम शुरुआती हैं और व्यापक प्रभावकारिता के लिए बड़े पैमाने पर फेज टू और थ्री ट्रायल्स की आवश्यकता है।
एमआरएनए तकनीक और कार्यप्रणाली
खबरों के अनुसार एंटरोमिक्स पारंपरिक कैंसर उपचार से पूरी तरह अलग है। यह एमआरएनए तकनीक पर आधारित है, वही तकनीक जो कोविड-19 वैक्सीन में इस्तेमाल हुई थी। इसमें कमजोर या निष्क्रिय वायरस नहीं होता, बल्कि यह शरीर की कोशिकाओं को निर्देश देता है कि वे कैंसर विशिष्ट प्रोटीन (एंटिजेन) उत्पन्न करें। प्रतिरक्षा प्रणाली इन एंटिजेन को पहचानकर केवल कैंसर कोशिकाओं पर हमला करती है, जिससे स्वस्थ कोशिकाएं सुरक्षित रहती हैं। वर्तमान में एंटरोमिक्स का प्रमुख फोकस कोलोरेक्टल कैंसर (बड़ी आंत का कैंसर) है, लेकिन शोधकर्ता ग्लियोब्लास्टोमा, मेलेनोमा और ऑकुलर मेलेनोमा जैसे आक्रामक कैंसरों पर भी इसका परीक्षण करने की योजना बना रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह वैक्सीन प्रत्येक रोगी की ट्यूमर प्रोफाइल के अनुरूप भी तैयार की जा सकती है।
आर्थिक प्रभाव
भारत जैसे विकासशील देशों में कैंसर केवल चिकित्सकीय समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक बोझ भी बन जाता है। एक कैंसर मरीज का इलाज अक्सर परिवार की पूरी बचत समाप्त कर देता है। कई परिवारों को संपत्ति बेचनी पड़ती है या कर्ज लेना पड़ता है। अक्सर यही आर्थिक संकट इलाज को अधूरा छोड़ने का कारण बनता है और मृत्यु दर को और बढ़ा देता है।
सामाजिक प्रभाव और भारत में संभावनाएं
यह वैक्सीन सामाजिक असमानताओं को कम करने में भी मदद कर सकती है। कैंसर गरीबों के लिए घातक है, क्योंकि इलाज महंगा है। भारत में, जहां कोलोरेक्टल और सर्वाइकल कैंसर आम हैं, यह वैक्सीन जीवन बचाने में सहायक हो सकती है। हालांकि पेटेंट और उत्पादन जैसी चुनौतियां भी हैं। कोविड-19 के दौरान एमआरएनए पेटेंट विवादों ने यह स्पष्ट किया कि इस क्षेत्र में बौद्धिक संपदा जटिल और विवादास्पद हो सकती है। फिर भी भारत-रूस की विशेष मैत्री इस संदर्भ में लाभप्रद हो सकती है।
कोविड-19 के दौरान स्पूतनिक वी वैक्सीन का भारत में सफल उपयोग इसका प्रमाण है। एंटरोमिक्स वैक्सीन कैंसर के इलाज में नई क्रांति का संकेत है, परंतु यह सावधानी और बड़े पैमाने पर मूल्यांकन के बाद ही व्यापक उपयोग के लिए तैयार होगी। भारत में दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माण उद्योग, मजबूत जेनेरिक दवा क्षेत्र और उन्नत बायोटेक अनुसंधान क्षमताएं मौजूद हैं। सीरम इंस्टीट्यूट, बायोकॉन, डॉ. रेड्डीज और भारत बायोटेक जैसी कंपनियों के पास उन्नत वैक्सीन का स्थानीय उत्पादन करने की क्षमता है। भारत की वैज्ञानिक और औद्योगिक क्षमता इस वैक्सीन को लोगों तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। यदि यह सफल रही, तो शायद कैंसर का नाम आने वाली पीढ़ियों के लिए भय का नाम नहीं रहेगा।
भारतीय परिप्रेक्ष्य
2023 में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के अनुसार, भारत में 14 लाख से अधिक लोग कैंसर से प्रभावित हुए। सरकार ने कैंसर की रोकथाम, समय पर पहचान और इलाज के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। 2025-26 के संघीय बजट में स्वास्थ्य मंत्रालय को कुल 99,858.56 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिसमें से 3,900.69 करोड़ रुपये स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए हैं। इस बजट के तहत 200 डे केयर कैंसर सेंटर अगले तीन वर्षों में सभी जिला अस्पतालों में स्थापित किए जाएंगे। इसके अलावा 36 जीवन रक्षक दवाओं पर आयात शुल्क पूरी तरह हटाया गया है और छह दवाओं पर केवल 5 प्रतिशत शुल्क रहेगा।
कैंसर नियंत्रण के लिए एनपीसीडीसीएस कार्यक्रम के तहत ओरल, स्तन और सर्वाइकल कैंसर की स्क्रीनिंग और जागरूकता पर जोर दिया गया है। अब तक 770 जिला एनसीडी क्लिनिक, 372 जिला डे केयर सेंटर और 6,410 कम्युनिटी हेल्थ सेंटर एनसीडी क्लिनिक स्थापित किए जा चुके हैं। इसके अलावा 19 राज्य कैंसर संस्थान और 20 टर्शियरी कैंसर सेंटर पूरे देश में स्थापित किए गए हैं।
आयुष्मान भारत योजना ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के कैंसर इलाज में मदद की है। 2024 तक 90 प्रतिशत पंजीकृत मरीजों का इलाज इस योजना के तहत शुरू हो चुका है। वहीं, हेल्थ मिनिस्टर कैंसर पेशेंट फंड और नेशनल कैंसर ग्रिड गरीब और ग्रामीण मरीजों को समय पर और किफायती इलाज सुनिश्चित करते हैं। भारत ने अनुसंधान के क्षेत्र में भी बड़ी प्रगति की है। भारत में कैंसर के बारे में जानकारी इकट्ठा करने और नीतियां बनाने में नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम ने 1982 से अहम भूमिका निभाई है।
वहीं, नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ कैंसर प्रिवेंशन एंड रिसर्च कैंसर स्क्रीनिंग और अनुसंधान के लिए मार्गदर्शन देता है। अप्रैल 2024 में नेक्सकार 19, देश की पहली देशी कार-टी सेल थैरेपी, विकसित की गई। यह ब्लड कैंसर के इलाज में एक नई उम्मीद लेकर आई है। सितंबर 2024 में क्वाड कैंसर मूनशॉट पहल के तहत भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ मिलकर सर्वाइकल कैंसर को खत्म करने की योजना शुरू की। जनवरी 2025 में एक्ट्रेक का विस्तार भी शुरू हुआ, ताकि उन्नत कैंसर इलाज और अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा सके।
