केवल बातचीत से बहलाने का आरोप साबित नहीं होता: हाईकोर्ट
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक किशोरी के कथित अपहरण से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि केवल पीड़िता से बातचीत करना ही ऐसा तथ्य नहीं है, जिसे बहला-फुसलाकर ले जाना माना जाए। पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट में अभियोजन ने केवल दो प्रत्यक्षदर्शी गवाहों का नाम दिया है—पहला शिकायतकर्ता स्वयं और दूसरा पीड़िता की माता । इन दोनों ने यह नहीं बताया कि अभियुक्त किस प्रकार पीड़िता को बहलाकर ले गया। केवल किसी से बातचीत करने से अगर पीड़िता घर छोड़ दे, तो वह दंडनीय अपराध नहीं बनता।
इसके अलावा कोर्ट ने वर्तमान मामले में अभियुक्त के खिलाफ आईपीसी की धारा 363(अपहरण के लिए दंड) के तहत दर्ज मुकदमे पर विचार करते हुए उक्त धारा के संबंध में स्पष्ट किया कि धारा 361(अपहरण) तभी प्रभावी होगी, जब नाबालिग को विधिसम्मत अभिभावक की अभिरक्षा से बिना सहमति के बाहर ले जाया जाए अथवा उसे कोई प्रलोभन, वादा, प्रस्ताव या प्रोत्साहन दिया जाए, जिसके फलस्वरूप वह अभिभावकत्व से बाहर चला जाए, लेकिन यदि ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है कि नाबालिग स्वेच्छा और अपने विवेक से अभिभावकत्व छोड़ दे, तो ऐसी परिस्थिति में इस धारा की प्रयोज्यता समाप्त हो जाती है।
उक्त आदेश न्यायमूर्ति विक्रम डी.चौहान की एकलपीठ ने हिमांशु दूबे की याचिका स्वीकार करते हुए पारित किया, जिसमें आवेदक ने आरोप पत्र और पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की है। मामले के अनुसार गऊरीबाजार थाना क्षेत्र, देवरिया की एक 16 वर्षीय किशोरी को बहलाकर ले जाने के आरोप में याची के खिलाफ प्राथमिक की दर्ज कराई गई। किशोरी के चाचा द्वारा 25 दिसंबर 2020 को दर्ज प्राथमिकी में आरोप लगाया गया कि उसकी भतीजी को आरोपी बहला-फुसलाकर ले गया।
घटना 24 दिसंबर की बताई गई, जबकि रिपोर्ट 24 घंटे बाद दर्ज हुई और विलंब का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। जांच में सामने आया कि किशोरी ने अपने बयान (सीआरपीसी की धारा 161 व 164) में कहा है कि वह परिवार वालों की मारपीट और बिजली के झटके देने से परेशान होकर 23 दिसंबर को खुद ही घर छोड़कर बस से सीवान चली गई थी।
उसने स्पष्ट किया कि आरोपी ने कोई जबरदस्ती या शारीरिक शोषण नहीं किया, जबकि किशोरी की मां के अनुसार उनकी बेटी अभियुक्त से मोबाइल पर बात करती थी और शादी करना चाहती थी। रोक-टोक के कारण ही वह घर से चली गई। याची के अधिवक्ता का तर्क है कि यह मामला पारिवारिक दबाव का परिणाम है और किशोरी अपनी मर्जी से घर छोड़कर चली गई थी, इसलिए आईपीसी की धारा 363 के तहत दर्ज मुकदमा निराधार है।
