"एग्रीमेंट टू सेल" से नहीं बनता ज़मीन पर हक़, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक जमीनी विवाद से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि केवल एग्रीमेंट टू सेल (विक्रय का करारनामा) होने से खरीदार को न तो ज़मीन पर मालिकाना हक़ मिलता है और न ही अधिग्रहण मुआवज़े में हिस्सा।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब तक पंजीकृत बिक्री विलेख (सेल डीड) निष्पादित और दर्ज न हो, तब तक स्वामित्व विक्रेता के पास ही रहता है। मुआवज़े का हक़ उसी का है जो अधिग्रहण के समय भूमि का वास्तविक स्वामी है, न कि उस व्यक्ति का जिसके पास केवल "एग्रीमेंट टू सेल" है।
पंजीकृत सेल डीड (विक्रय विलेख) ही स्वामित्व का असली आधार है, 'एग्रीमेंट टू सेल' केवल मुकदमेबाज़ी का अधिकार देता है। इसके अलावा याचियों का यह तर्क कि उनके लंबित वाद और स्थगन आदेश (इंजंक्शन) उन्हें "इच्छुक व्यक्ति" बना देते हैं, इसे खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबित मुकदमों या स्थगन आदेश (स्टे) के आधार पर मुआवज़े का दावा नहीं बनता।
कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि भविष्य में यदि याची अपने दावे में सफल होते हैं तो उन्हें सिर्फ़ धनराशि (मनी डिक्री) मिलेगी, न कि भूमि-अधिग्रहण मुआवजा। उक्त आदेश न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की एकलपीठ ने हमीद और नौ अन्य द्वारा दाखिल याचिका को खारिज करते हुए पारित किया।
कोर्ट ने मेरठ के भूमि अधिग्रहण पुनर्वास और पुनर्स्थापन प्राधिकरण द्वारा पारित आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि अधिकार का बंटवारा सिर्फ़ मौजूदा, वास्तविक स्वामियों के बीच हो सकता है, भविष्य में संभावित अधिकार रखने वालों के बीच नहीं।
मामले के अनुसार मेरठ के बिजवाली गांव की ज़मीन (खसरा 346 व 426) गंगा एक्सप्रेसवे परियोजना के लिए अधिग्रहित हुई। याचियों ने दावा किया कि उनके पक्ष में साल 2013-14 में कई "एग्रीमेंट टू सेल" हुए थे, जिन पर मुकदमे लंबित हैं। उन्होंने कहा कि इस आधार पर वे मुआवज़े के हक़दार हैं। हालांकि कोर्ट ने उन्हें केवल 'एग्रीमेंट टू सेल' के आधार पर मुआवजे का हकदार नहीं माना।
