कुंदरकी उपचुनाव को लेकर प्रकाशित लेख का चुनाव आयोग ने किया खंडन, जानें क्या कहा...

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भ्रामक ग्राफ और अपारदर्शी डेटा विश्लेषण गुमराह करने वाला : चुनाव आयोग

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के कुंदरकी विधानसभा उपचुनाव को लेकर हाल ही में प्रकाशित एक लेख और उसके ग्राफ़ों का निर्वाचन आयोग ने खंडन किया है और कहा है कि ये आयोग के आंकड़ों से मेल भी नहीं खाते हैं।

आयोग ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट एक्स पर लेख के ग्राफ-3 को लेकर पोस्ट करते हुए कहा है कि यह ग्राफ़ नवंबर 2024 के उपचुनाव में मतदान प्रतिशत को अप्रैल 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बूथ-वार वोट प्रतिशत से जोड़कर दिखाता है।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, लोकसभा चुनावों में 128 बूथ ऐसे थे जहाँ भाजपा को 10 प्रतिशत से कम वोट मिले थे। इनमें से 66 बूथों (50 प्रतिशत से अधिक) में उपचुनाव के दौरान मतदान प्रतिशत 46 प्रतिशत से ऊपर था, जबकि लेख के ग्राफ़ में 0-10 प्रतिशत श्रेणी में ऐसा कोई डेटा दिखाई नहीं देता। 

निर्वाचन आयोग ने कहा है कि लेख में दावा किया गया है कि कुंदरकी में मतदान प्रतिशत 67.7 प्रतिशत से गिरकर 57.8 प्रतिशत होने का कारण मुस्लिम मतदाताओं का दमन था जो यह गलत है। उप्र की आठ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में मतदान प्रतिशत लोकसभा चुनावों की तुलना में कम हुआ है। 

उदाहरण के लिए, गाज़ियाबाद विधानसभा में मतदान लगभग 14.5 प्रतिशत घटा, जबकि वहाँ मतदाता दमन की कोई शिकायत दर्ज नहीं हुयी। लेख में मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर बहादरपुर गाँव का उदाहरण दिया गया है। यहाँ पाँच मतदान केंद्रों में कुल 3544 मतदाता हैं, जिनमें 3075 मुस्लिम हैं। 

लेख के अनुसार लोकसभा और उपचुनाव के बीच 124 नाम हटाए गए, जिनमें 110 मुस्लिम थे (लगभग 89 प्रतिशत) हैं। जबकि आयोग के मुताबिक बताए गए आंकड़े वास्तविकता से मेल नहीं खाते हैं। आयोग ने कहा है कि चुनाव आयोग धर्म-आधारित मतदाता डेटा सार्वजनिक नहीं करता है। 

लेख में जो पाँच ग्राफ़ शामिल किए गए हैं, उनमें से तीन का आधार कथित निजी डेटा है। ऐसे में उसके निष्कर्षों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। लेख ने सीएसडीएस सर्वेक्षण का हवाला देकर दावा किया है कि केवल दो प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं ने लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा को वोट दिया। इस बावत आयोग का कहना है कि सर्वेक्षण हमेशा त्रुटिहीन नहीं होते और न ही यह माना जा सकता है कि भविष्य में भी यही अनुपात रहेगा। 

उप्र में कई एग्ज़िट पोल और प्री-पोल सर्वेक्षण हाल के चुनावों में गलत साबित हुए थे। आयोग ने कहा है कि किसी भी चुनावी नतीजे पर सवाल उठाना लोकतंत्र में स्वाभाविक है, लेकिन इसके लिए ठोस और पारदर्शी आंकड़ों पर आधारित तर्क आवश्यक हैं। भ्रामक ग्राफ़ और अपारदर्शी डेटा पर आधारित विश्लेषण न केवल गुमराह करता है बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श को भी कमजोर करता है।

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