कानपुर : बच्चों में बढ़ रही भूलने, गुस्सा करने और व्यवहार में हिंसक प्रवृत्ति, ऐसे करें बचाव...

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Edited By Amrit Vichar
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GSVM मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों ने की 100 से अधिक बच्चों पर स्टडी

कानपुर, अमृत विचार। अगर आपके घर में अधिक झगड़ा होता हैं या बच्चे का स्क्रीन टाइम काफी ज्यादा है तो ऐसे बच्चों में आ रहे व्यवहार पर नजर रखने की काफी जरूरत है। क्योंकि बार-बार घर में झगड़ा होने और स्क्रीन टाइम बढ़ने से बच्चों में न्यूरो ट्रांसमीटर असंतुलित होने की समस्या देखी गई, जिसकी वजह से उनमे चीजों को भूलने, गुस्सा करने, चिड़चिड़ापन और मानसिक अस्थिरता के लक्षण प्रतीत हुए है। यह समस्या आगे चलकर अवसाद का भी कारण बन सकती हैं। 

जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मानिसक रोग विभाग के बाल क्लीनिक में एक महीने में डॉक्टरों ने 121 बच्चों पर स्टडी की है, जिनमे ऐसे बच्चे शामिल किए गए, जिनका पढ़ाई में मन न लगता, व्यवहार में हिंसक प्रवृत्ति आने, गुस्से में खुद को नुकसान पहुंचाने, खुद का हाथ काट लेने, दीवार पर सिर मारने और बाल को नोचने आदि समस्या से ग्रस्त थे।

विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय चौधरी ने बताया कि 121 बच्चों को तीन आयु वर्गों में बांटकर उनपर स्टडी की गई है। चार से आठ वर्ष बच्चों में बुद्धि से कमजोरी, बार-बार सामान भूलने, मोबाइल देखकर ही खाना खाने, स्कूल न जाने और चिड़चिड़ापन की समस्या देखी गई।

नौ से 14 वर्ष के बच्चों में मिर्गी जैसे दौरे, तनाव, फोन स्क्रीन की लत और माता-पिता व परिजन से अभद्रता करने की हरकत सामने आई हैं। जबकि 15 से 17 वर्ष के बच्चों में रिश्तों में असंतुलन, ब्रेकअप के बाद अवसाद, आत्महत्या के विचार और खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति प्रमुख देखी गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह स्क्रीन टाइम और पारिवारिक झगड़े होना है।

बताया कि लगातार छह से आठ घंटे लैपटॉप या मोबाइल की स्क्रीन देखने से दिमाग में डोपामीन नामक न्यूरो ट्रांसमीटर असंतुलित हो जाता है, जिससे असंतुलन मानसिक अस्थिरता, भूलने और गुस्से जैसी दिक्कतें होती है। वहीं, घर का झगड़ालू माहौल और विरोधाभासी व्यवहार बच्चे के मन पर गहरा असर डालते हैं।

ऐसे करें बचाव 

डॉ.धनंजय चौधरी ने बताया कि बच्चा अगर गुस्से या तनाव की स्थिति में है तो उस वक्त उसे डांटने या समझाने से बचना चाहिए। परिवार में शांति और आपस में संवाद बनाकर रखें। बच्चों के सामने झगड़ा न करें। बच्चे से विरोधाभासी बातें न करें, उसकी समस्या को शांत मन से जरूर सुनें।

बच्चे का अगर स्क्रीन टाइम अधिक है तो उसकी सीमित करने की पूरी कोशिश करें। बच्चों को संगीत, योग या मार्शल आर्ट जैसी गतिविधियों के लिए प्रेरित करें। खानपान पर विशेष ध्यान दें और पौष्टिक युक्त चीजों का सेवन कराएं। व्यवहार में बदलाव होने पर डॉक्टर से संपर्क जरूर करें।

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