सिस्टम की खामी झेल रहे निराश्रित पशु, मौके पर नहीं त्वरित इलाज की व्यवस्था
प्रशांत सक्सेना/लखनऊ, अमृत विचार : बड़े शहरों में हादसे के दौरान घायल या गंभीर निराश्रित गोवंश के उपचार की बात करें तो नगर निगम ही एक मात्र सहारा है, जो सूचना मिलने पर कान्हा उपवन या अन्य सरकारी व्यवस्थाओं में ले जाकर इलाज और संरक्षण करता तो करता है लेकिन दर्द से तड़पते और खून बहते गोवंशों के मौके पर उपचार की व्यवस्था नहीं है। पहले से अन्य सूचना और जाम के कारण इन्हें मदद करने में देरी होती है। इस बीच गोवंशों की सड़क पर या फिर वाहन से ले जाते समय मौत हो जाती है। इसी का फायदा कथित एनजीओ और उनके दलाल उठाकर पशुओं की फोटो-वीडियो बनाकर रुपये मांगने का धंधा शुरू कर देते हैं।
दरअसल सबसे पहले घायल गोवंशों के प्राथमिक उपचार की जरूरत होती है। लेकिन, पशु पालन विभाग के पास समन्वयक नहीं है। आम व्यक्तियों के लिए निराश्रितों का उपचार कराना बेहद मुश्किल है। बहुत से सूचना देने वाले ऐसे होते हैं जिन्हें विभाग, अफसरों के नंबर व क्षेत्र की जानकारी तक नहीं है और जिन्हें होती है वह विभागीय खींचतान में फंस जाते हैं। एनजीओ से जुडे़ लोग पशुओं की फोटो-वीडियो बनाकर रुपये मांगने का धंधा शुरू कर देते हैं। इधर-उधर कहने से पशु पालन के चिकित्सक उपचार भी कर देते हैं, लेकिन रात में यह भी नहीं हो पाता है। इसके अलावा नगर निगम, नगर पालिका व नगर पंचायत क्षेत्र में बंदर, कुत्ता व अन्य छोटे पशुओं का उपचार और संरक्षण करना इससे भी कठिन है। जिन्हें यह कार्य दिया गया वह एक-दूसरे पर पल्ला झाड़ते हैं।
दोपहर ढाई बजे बंद हो जाते अस्पताल
ग्रामीण क्षेत्रों के हाल नगर से बुरा है। पशु चिकित्सालय सुबह 9 से दोपहर 2:50 बजे तक खुलते हैं। इस बीच निजी हो या निराश्रित पशु का चिकित्सक उपचार करा देते हैं। लेकिन अस्पताल बंद होने के बाद और खासकर रात के समय सबके बस का नहीं है। कारण चिकित्सकों को नॉन प्रैक्टिस एलाउंस नहीं मिलता है। जो नियमों के तहत दोपहर 2:50 बजे तक ही अस्पताल खोलते हैं। लेकिन, इनकी इमरजेंसी 24 घंटे रहती है। इसके अलावा अन्य विभागीय कामों से यह दबे हैं। सर्जरी, प्लास्टर, जांच आदि की चिकित्सालयों पर इंतजाम नहीं है। चिकित्सकों व स्टाफ की भारी कमी है। ग्राम पंचायतों पर दुर्घटना में घायल या बीमार गोवंशों को उपचार और संरक्षण के लिए गोशाला पहुंचाना आसान नहीं है।
1962 सेवा पर अधिक लोड
ग्रामीण इलाकों में पशुओं के उपचार के लिए संचालित 1962 मोबाइल वेटरनिरी यूनिट सबसे अधिक पशुओं का उपचार करती है। लेकिन, कॉल अधिक होने के कारण आकस्मिक सेवाएं नहीं दे पा रही है। कॉलों की कतार से नंबर घंटों वेटिंग जाता है और लगने पर क्रम से यूनिट द्वारा पहुंचकर उपचार होता है। सुबह की सूचना पर शाम हो जाती है और गंभीर पशु दम तोड़ देते हैं। सेवा भी सुबह 9 से शाम 7 बजे तक है। एक लाख पशु पर एक यूनिट है, इसमें कुछ उपचार और कुछ गांवों में कैंप करती हैं। नई यूनिट न मिलने तक सभी उपचार में लगाया जाना उचित होगा।
पशुओं से सम्बंधित एनजीओ की जांच कराएंगे। सभी जिलों को निर्देशित करेंगे। बिना मानक मिलने पर नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगी।-मुकेश मेश्राम, प्रमुख सचिव पशुधन उप्र
लखनऊ में संचालित एनजीओ की जांच के निर्देश सीवीओ को दिए हैं। इसी तरह सभी जिलों की जांच कराएंगे। वहीं, जिलेस्तर पर रात में चिकित्सा की व्यवस्था भी करेंगे।- डॉ. मेमपाल, निदेशक रोग नियंत्रण एवं प्रक्षेत्र पशुपालन विभाग।
