डॉ. मानसी के काव्य संग्रह "नदी सी मैं" का लोकार्पण... कवियों ने बांधा समां
लखनऊ, अमृत विचार। कवयित्री डॉ. मानसी द्विवेदी कुसुम के काव्य संग्रह "नदी सी मैं" का रविवार को गोमतीनगर स्थित एक होटल में लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया। विधान परिषद के सभापति कुंवर मानवेन्द्र सिंह, पद्मश्री डॉ. विद्या बिंदु सिंह, एमएलसी पवन सिंह चौहान और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार महेंद्र भीष्म ने काव्य संग्रह का लोकार्पण किया।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की पूर्व प्रधान संपादक पद्मश्री डॉ. विद्या बिंदु सिंह ने कहा कि कवयित्री डॉ. मानसी ने अपने इस संग्रह में जिस संवेदना के साथ रचनाएं लिखी हैं। वो संवेदना उनके भीतर बनी रहे तो यह साहित्य जगत के लिए बहुत अच्छा होगा। उन्होंने कहा कि संग्रह की भाषा-शैली, बिंब-योजना और भावभूमि पाठक को आत्मानुभूति की गहन यात्रा पर ले जाती है। विधान परिषद के सभापति कुंवर मानवेन्द्र सिंह ने काव्य संग्रह प्रकाशित होने पर डॉ. मानसी को बधाई दी। उन्होंने कहा कि साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित होती रहती हैं तो यह समाज के लिए अच्छा रहता है।
उन्होंने कहा कि डॉ. मानसी की रचनाएं संवेदना, स्त्री-स्वाभिमान और जीवन के विविध रंगों को अत्यंत सहज और प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त करती हैं। यह आज की स्त्री की अभिव्यक्ति का सशक्त दस्तावेज़ है। हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार महेंद्र भीष्म ने कहा कि मानसी की रचनाएं सुमित्रा नंदन पंत और महादेवी वर्मा की याद दिलाती हैं। उन्होंने कहा कि इस संग्रह में संवेदनाओं के छंद हैं। इसमें जीवन का संघर्ष है।
उन्होंने कहा कि एक रचनाकार अपने जीवन में किस तरह से संघर्ष करता है वह इस किताब में स्पष्ट नजर आता है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक दूसरों के दर्द को महसूस करने में सहायक सिद्ध होगी। वैज्ञानिक और व्यंग्यकार पंकज प्रसून ने काव्य संग्रह की समीक्षा भी काव्यमय अंदाज में की। उन्होंने कहा, उनकी भाषा, नदी का पानी नहीं, नदी का बहाव है, सीधी सरल पर भीतर तक कटान करती हुई। बिना आडंबर, बिना शोर, जैसे किसी मां की रसोई में, अनजाने गुनगुनाया गया गीत, धीरे-धीरे कविता में ढल जाए। उनका शिल्प यादों की लिपाई सा कोमल, भाव झुर्रियों में उतर आया चांद सा निश्छल, और कहन उस लड़की की, जो आसुओं को बोझ नहीं, बल्कि अपनी रीढ़ की ताक़त मानती है। इसीलिए मानसी को पढ़ना, सिर्फ़ पढ़ना नहीं होता, यह किसी अनकहे सत्य से मिलना है। किसी भूली हुई स्मृति के कंधे पर धीरे से हाथ रखने जैसा है। इस मौके पर डॉ. मानसी द्विवेदी कुसुम ने कहा कि नदी की तरह हर स्त्री अपने भीतर धारा, ऊर्जा, संघर्ष और सौंदर्य समेटे बहती रहती है। इस संग्रह की कविताएं उसी यात्रा का साक्ष्य हैं।
उन्होंने सुनाया, "मेरे मिजाज़ में मालिक ने चपलता दे दी, यूं तो सब कुछ दिया कुछ एक विफलता दे दी, मैंने देखा ही नहीं पांव के छालों की तरफ, और संघर्ष ने सौ बार सफलता दे दी।" राजेश यादव द्वारा संचालित इस आयोजन में बीडी द्विवेदी, प्रो. नवनीत, नवल कान्त सिन्हा, डॉ. ओम शर्मा ने भी विचार व्यक्त किए।
