अल्लाह की याद और इंसानियत का पैग़ाम साथ

Amrit Vichar Network
Edited By Pradeep Kumar
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अगर कोई बरेली की आत्मा को महसूस करना चाहता है, तो उसे सिर्फ नाथ मंदिर ही नहीं, बल्कि नौमहला की गलियों तक भी जाना होगा। यह इलाका बरेली की तहज़ीब, आस्था और एकता का सबसे सुंदर प्रतीक है। यहाँ हर दीवार सूफियों, मोहब्बत और इंसानियत की किसी कहानी को बयाँ करती है — बरेली में जैसे शिव के साधकों की परंपरा गहरी है, वैसे ही सूफी संतों की रूहानियत भी हर पत्थर में बसती है। और इसी रूहानियत की सबसे ऊँची चोटी पर है — आला हजरत की दरगाह।

आला हजरत इमाम अहमद रज़ा खान (1856–1921) न केवल बरेली के, बल्कि पूरे इस्लामी जगत के एक महान विद्वान और सूफी संत थे। उन्होंने अपने ज्ञान, तर्क और करुणा से दुनिया को यह दिखाया कि धर्म का असली उद्देश्य नफरत नहीं, बल्कि इंसान को इंसान से जोड़ना है।  कहा जाता है कि आला हजरत ने बरेली की मिट्टी को अपनी कलम से अमर बना दिया। उन्होंने फतावा-ए-रज़विया जैसे ग्रंथों के माध्यम से इस्लामी दर्शन को एक नई दृष्टि दी। वे उस दौर में भी धार्मिक कट्टरता के विरोधी थे, जब समाज गुटों में बँट रहा था। अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे धर्म के उपासक को तकलीफ़ देता है, तो वह खुद इस्लाम की शिक्षा के विरुद्ध जाता है। इसी सोच ने बरेली की पहचान धर्म से पहले इंसानियत की बनाई । 

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उर्स-ए-रज़वी — आध्यात्मिक मेला और इंसानियत का उत्सव

हर साल रबी-उल-अव्वल महीने में मनाया जाने वाला “उर्स-ए-रज़वी” बरेली का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है। तीन दिनों तक दरगाह परिसर में आध्यात्मिक वातावरण रहता है। देश-विदेश से आए आलिम, मौलाना और सूफी यहाँ तकरीरें (विचार भाषण) देते हैं।

—दरगाह परिसर के बाहर लगने वाला मेला, जिसमें किताबें, इत्र, तस्बीह और सूफी संगीत की धुनें गूंजती हैं, वह श्रद्धालुओं के लिए किसी उत्सव से कम नहीं।

—हर साल लगभग दस लाख से अधिक लोग इस मौके पर बरेली पहुँचते हैं। रेलवे और नगर प्रशासन विशेष प्रबंध करते हैं। खास बात यह है कि इस दौरान न सिर्फ मुस्लिम, बल्कि हिंदू, सिख और ईसाई समुदाय के लोग भी सेवा में शामिल होते हैं। नगर निगम की टीम से लेकर पुलिस कर्मियों तक सभी इसे “धार्मिक नहीं, मानवीय पर्व” की तरह मानते हैं। सूफी संगीत और रूहानी माहौल

—आला हजरत की दरगाह में शाम के वक्त जब कव्वाली शुरू होती है — “नज़र-ए-मदीना से मंज़र-ए-बरेली तक” तो लगता है जैसे आत्मा और संगीत एकाकार हो गए हों। सूफी गायकों की तान और दुआ की लय वातावरण को भक्ति में डूबो देती है।

आला हजरत का संदेश  “इंसानियत सबसे ऊपर”
आला हजरत का दर्शन यह था कि धर्म किसी दीवार का नहीं, बल्कि एक पुल का नाम है। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने सौ साल पहले थे। उन्होंने कहा था “जब तक किसी भूखे को खाना और किसी नंगे को कपड़ा नहीं मिलेगा, तब तक तुम्हारी नमाज़ें भी अधूरी हैं।” बरेली के लोग आज भी इस संदेश को जीते हैं। दरगाह के लंगर में रोज़ाना हज़ारों लोगों को बिना किसी भेदभाव के भोजन कराया जाता है ।   यहाँ कोई यह नहीं पूछता कि कौन हिंदू है, कौन मुसलमान। सब एक ही कतार में बैठकर खाना खाते हैं, और यही इस शहर की असली ताकत है।

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दरगाह आला हजरत : श्रद्धा और शांति का संगम

—दरगाह आला हजरत  केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की भावनाओं का केंद्र है। हर साल उर्स-ए-रज़वी” के अवसर पर देश-विदेश से हजारों ज़ायरीन यहां आते हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश, ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका तक से लोग चादर चढ़ाने आते हैं।

—दरगाह परिसर में प्रवेश करते ही जो सुकून महसूस होता है, वह शब्दों में नहीं बताया जा सकता। चारों ओर क़ुरआनी आयतें, गुलाब की खुशबू और या रज़ा की पुकार वातावरण को आध्यात्मिक बना देती है।

—यहाँ का मुख्य गुम्बद सफ़ेद संगमरमर का है, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा है —रज़ा का शहर बरेली, मुहब्बत की ज़मीन।

—आला हजरत की मज़ार के पास की जाने वाली “सलात-ओ-सलाम” (प्रार्थना) में जो विनम्रता दिखती है, वही इस दरगाह की आत्मा है।

—दरगाह के प्रमुख खादिम मौलाना फ़ैज़ान रज़ा बताते हैं 

—यहाँ हर आने वाला ज़ायरीन सबसे पहले ‘सलाम’ करता है और फिर दूसरों के लिए दुआ मांगता है।

—यही सूफियत का असली मतलब है — अपने लिए नहीं, सबके लिए भलाई मांगना।”

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नौमहला —
तहज़ीब और एकता की गवाही देने वाला इलाका आला हजरत की दरगाह के आसपास का इलाका “नौमहला कहलाता है। यह नाम मुगलकालीन स्थापत्य से आया है।  यहाँ नौ मंज़िलों वाले पुराने 
महलों के अवशेष कभी मौजूद थे। आज यह इलाका धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बरेली का हृदय बन 
चुका है।

नौमहला की गलियाँ संकरी हैं, लेकिन दिल बहुत बड़े हैं। यहाँ दरगाह के ठीक सामने एक प्राचीन शिव मंदिर भी है, जिसके पुजारी हर साल उर्स के दौरान मुसलमानों को जल पिलाने का “सेवा स्टॉल लगाते हैं। वहीं, दरगाह की ओर से भी सावन में कांवड़ियों को पानी और नींबू-शरबत बाँटा जाता है। यह दृश्य बरेली की “गंगा-जमनी तहज़ीब” का जीवंत उदाहरण है।

स्थानीय निवासी सलीम बताते हैं , हमारे यहाँ कोई दीवार नहीं जो बांट सके। उर्स में पंडितजी भी आते हैं, और सावन में मौलवी साहब भी कांवड़ियों को आशीर्वाद देते हैं। इसी सौहार्द की वजह से नौमहला सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रतीक बन चुका है।

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