मेरा शहर मेरी प्रेरणा : नौटंकी शैली में रामायण लिखने वाले राधेश्याम कथावाचक
नौटंकी की शैली में लिखी गई रामायण ऐसी अनोखी कृति थी जिसने राधेश्याम कथावाचक को प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया, इस कृति का नाम भी उनके नाम पर राधेश्याम रामायण पड़ा। अपने जीवनकाल में राधेश्याम कथावाचक ने न सिर्फ तमाम नाटक लिखे, बल्कि कई फिल्मों की पटकथा लिखने के साथ गीतों की रचना की। हालांकि सबसे ज्यादा ख्याति उन्हें राधेश्याम रामायण से ही मिली। रामलीला के मंचों पर आज भी उनकी गायन शैली का प्रयोग किया जाता है। इस रामायण की विशेषता यह है कि राधेश्याम कथावाचक ने इसमें संवाद और अभिनय पक्ष को भी जोड़ा। इस कारण इसके संवाद मंचों पर की जाने वाली रामलीला में अपनाए गए। इस रामायण के मंचनीय होने के साथ संवाद और गायन गुण भी है। आज घर-घर में राधेश्याम रामायण है।

राधेश्याम कथावाचक का जन्म 25 नवंबर 1890 में शहर के मोहल्ला बिहारीपुर में हुआ था। राधेश्याम कथावाचक पर शोध कर कई किताबें लिखने वाले कृष्णायन कॉलोनी डेलापीर निवासी हरिशंकर शर्मा बताते हैं कि नौटंकी शैली राधेश्याम रामायण की सबसे बड़ी विशेषता है। उदाहरण के तौर पर पंचवटी के प्रसंग में उन्होंने लिखा है- ‘मेरी नाक गई सो गई, अब अपनी नाक संभालो तुम, यदि जग में ऊंची नाक नहीं तो नकटा नाम धरा लो तुम’, उन्होंने इसी लोक छंद के आधार पर अपनी रामायण की रचना की है, जो आगे चलकर तर्ज राधेश्याम या राधेश्यामी छंद के नाम से प्रसिद्ध हुई। इन छंदों को उनके नाम से जाना गया, जो उनकी बड़ी उपलब्धि थी। हरिशंकर शर्मा कहते हैं, पंडित जी लोक व्यक्ति थे, उस वक्त नौटंकी ( स्वांग), रामलीला, रास, आला गायकी, लोक गीत का चलन था। सबसे ज्यादा उत्तर भारत में आल्हा गाई जाती थी, राधेश्याम रामायण इतनी प्रसिद्ध हुई कि वह सावन के दिनों में गांवों की चौपाल और शहरी इलाकों में गाकर सुनाई जाती थी।
हरिशंकर बताते हैं कि पांच साल पहले उनकी मुलाकात जैसलमेर के एक बुजुर्ग सज्जन से हुई थी, वह उन्हें जयपुर में मीरा महोत्सव में मिले थे। उन्होंने पंडित जी से जुड़ा एक वाकया सुनाया। बताया कि पंडित जी यहां कथा सुनाते थे, उनका खेतों में बड़ा सा मंच के रूप में मचान बनता था। पंडितजी ने पूर्व दिशा से रामायण की शुरुआत की थी, उनके चारों ओर श्रोता बैठे थे, उन्होंने रामायण के विभिन्न प्रसंग पूर्व, पश्चिमी और दक्षिण दिशा की ओर अपना आसन करके सुनाए, वहां पर 50 से हजार से ज्यादा श्रोता थे। वहां कोई माइक नहीं था, उन्होंने अपने कंठ से रामायण सुनाई, उनकी आवाज आखिर में बैठे व्यक्ति तक पहुंचती थी। वर्ष 1930 में बरेली के साहूकारा स्थित दाऊ जी मंदिर में वहां के एक संगीतज्ञ नारायाण गोस्वामी थे, जिन्होंने राधेश्याम कथावाचक की रामायण को संगीतमय गायन ग्रामोफोन रिकार्ड के लिया किया था। जिसके रिकार्ड एचएमबी व अन्य कंपनियों ने रिकार्ड जारी किए थे।

25 कथा खंड और आठ भाग में है राधेश्याम रामायण
राधेश्याम रामायण 25 कथा कांड और आठ भाग में है। मोहल्ला बिहारीपुर में वर्ष 1920 में राधेश्याम प्रेस की स्थापना हुई थी। इससे पहले उनकी रामायण आगरा, मुरादाबाद, लखनऊ और मथुरा से प्रकाशित होती थी। छोटे कथा खंड यहीं से प्रकाशित होते थे। उनका गायन, ढोलक और हारमोनियम पर होता था। वह खुद हारमोनियम बजाते थे। राधेश्याम रामायण संस्कृत और उर्दू मिश्रित खड़ी बोली में है। जिसमें मुहावरे, लोकयुक्तियों का प्रयोग किया गया, जो बहुत सरल है, जिसे लोग आसानी से समझ जाते हैं, जिन्हें उन्हें छंद का अर्थ बताने की जरूरत नहीं पड़ती है। यही वजह है कि यह बहुत जल्दी घर-घर तक पहुंच गई। राधेश्याम के पिता बांकेलाल शर्मा कथावाचक थे, वह भी चाहते थे कि बेटा उन्हीं की तरह कथावाचक बने। राधेश्याम ने 17-18 वर्ष की अवस्था में ही रामायण के कथा खंडों को लिख डाला था।
नाटकों को राष्ट्रीय भावनाओं से जोड़ा
राधेश्याम का पेशा कथावाचन का था, नाटक उनका शौक था। लोगों के बीच उनके नाटक बेहद लोकप्रिय थे। उनके वीर अभिमन्यु नाटक को सबसे ज्यादा प्रसिद्ध मिली, जिसका देशभर के स्कूल- कॉलेजों, थिएटर, मंचों पर डेढ़ हजार से अधिक बार मंचन किया जा चुका है। आज भी इस नाटक का मंचन होता है। राधेश्याम ने अपने नाटकों को राष्ट्रीय भावनाओं से भी जोड़ा, जिसमें अछूत उद्धार और समाज सुधार की प्रमुखता थी। उन्होंने करीब 14 नाटक लिखे। जिसमें श्रवणकुमार, परिवर्तन, मशरिकी हूर, नारद मोह, महर्षि वाल्मीकि आदि सम्मिलित हैं। जिस समय राधेश्याम ने इस क्षेत्र में कदम रखा, उस समय पारसी रंगमंच का प्रभाव था। उन्होंने भारतीय पौराणिक आख्यानों को लेकर नाटकों की रचना की। नाटकों को नई दिशा दी।
राधेश्याम कथावाचक का फिल्मी सफर
राधेश्याम कथावाचक ने 1931 में फिल्म शकुंतला के संवाद और कहानी लिखी थी। श्री सत्यनारायण फिल्म की कहानी के साथ गीतों को भी लिखा। फिल्म झांसी की रानी लक्ष्मीबाई में लिखे उनके गीत को मोहम्मद रफी ने गाया था। उनकी फिल्में काफी सफल रहीं। 26 अगस्त 1963 में उनका देहांत हो गया।
राधेश्याम पर लिखीं किताबें
‘सनातन के प्रहरी पं. राधेश्याम कथावाचक’ किताब के लेखक हरिशंकर शर्मा कहते हैं कि पंडितजी ने राधेश्याम रामायण को सरल रूप में प्रस्तुत किया। उनके द्वारा संपादित पुस्तक राधेश्याम कथावाचक की डायरी ‘अपने समय का सच’ महाराष्ट्र विवि से संबद्ध महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल है। गुरुकुल कांगड़ी विवि के आर्काइव में उनकी दो किताबें ‘रंगायन’ और ‘राधेश्याम कथा वाचक: सफर एक सदी’ है।
कथावाचक राधेश्याम का हारमोनियम
संगीत और रंगमंच के क्षेत्र में बरेली की एक गहरी और बहुआयामी विरासत है। बरेली की यह कलात्मक पहचान पारंपरिक कला विधाओं और आधुनिक अभिव्यक्तियों के एक अनूठे संगम का प्रमाण है, जो शहर के सांस्कृतिक ताने-बाने को निरंतर समृद्ध कर रही है। इतिहास की गूंज वर्तमान की आवाज़ के साथ मिलकर यहां का संगीत और रंगमंच एक अनूठी और जीवंत सांस्कृतिक पहचान बना रहा है। यह शहर इस बात का एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे पारंपरिक कला विधाएं आधुनिक अभिव्यक्तियों के साथ मिलकर किसी क्षेत्र की कलात्मक पहचान को न केवल जीवित रखती हैं, बल्कि उसे निरंतर समृद्ध भी करती हैं।
प्रस्तुति-राम राज मिश्रा
