संपादकीय: अत्यावश्यक अपील
जी–20 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दुरुपयोगों को रोकने के लिए एक वैश्विक समझौते की अपील वर्तमान भू–राजनीतिक और तकनीकी परिस्थितियों में अत्यंत महत्वपूर्ण और समयोचित है। एआई आधारित प्रणालियों को दुनिया जिस तेजी से अपना रही है, उसी गति से दुरुपयोग की आशंकाएं भी बढ़ी हैं। चाहे वह चुनावी हस्तक्षेप हो, साइबर हमले, डीपफेक प्रोपगेंडा या आर्थिक अपराध। ऐसे में इस मुद्दे को जी–20 के उच्चतम राजनीतिक मंच पर उठाना साबित करता है कि भारत तकनीकी नैतिकता और मानव सुरक्षा को लेकर वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में आना चाहता है।
जी–20 के देश, अमेरिका से लेकर यूरोप, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया तक सभी डीपफेक, डेटा चोरी, साइबर फ्रॉड और डिजिटल चुनावी हेरफेर जैसी तमाम चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। भारत खुद सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में डीपफेक के जोखिमों को झेल रहा है। मतलब यह समस्या सार्वभौमिक है और इसे राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर रहकर हल नहीं किया जा सकता। साइबर युद्ध में एआई हथियार बन रहा है।
आतंकवादी संगठन एआई मॉडल्स का उपयोग भर्ती, फेक आइडेंटिटी, हैकिंग और ड्रोन ऑपरेशन के लिए करने लगे हैं। यदि संयुक्त नियम नहीं बनाए गए, तो तकनीकी अराजकता वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा बन सकती है, इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी द्वारा डेटा सुरक्षा, एआई डेवलपमेंट, एथिक्स और डीपफेक नियंत्रण जैसे मानकों पर वैश्विक संधि का प्रस्ताव एक निर्णायक कदम हो सकता है, क्योंकि यह तकनीकी समाधान के साथ-साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी प्रश्न है। जी–20 देश मिलकर ग्लोबल एआई रिस्क रजिस्टर, क्रॉस–बॉर्डर साइबर अटैक प्रोटोकॉल और डीपफेक ट्रैकिंग नेटवर्क जैसे कई मॉडल विकसित कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियां वित्त-केंद्रित की जगह मानव–केंद्रित होनी चाहिए, बहुत दूरगामी सोच है। यह मुनाफे को प्राथमिकता देने वाली पूंजी संचालित टेक–इकोसिस्टम कंपनियों की उन खामियों की ओर इशारा है, जिसका दुष्प्रभाव समाज, गोपनीयता तथा नैतिकता पर पड़ता है। मानव–केंद्रित तकनीक का मतलब है, समावेशी डिज़ाइन, डिजिटल सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और सामाजिक हित को सर्वोपरि रखना। बदल चुके भू-राजनीतिक परिदृश्य में प्रधानमंत्री का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बदलाव की अनिवार्यता पर जोर उचित है।
भारत जैसे देशों की आर्थिक, जनसांख्यिकीय और रणनीतिक भूमिका आज पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली है, लेकिन वैश्विक छवि मजबूत होने के बावजूद भारत की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता आसान नहीं, क्योंकि यह मौजूदा शक्तियों, विशेषकर चीन की राजनीति और वीटो संरचना से जुड़ा सवाल बन जाता है। प्रधानमंत्री ने इब्सा यानी भारत–ब्राज़ील–दक्षिण अफ्रीका की भूमिका भी रेखांकित की, ये मिलकर ग्लोबल साउथ की आवाज़ को मजबूत कर सकते हैं और संयुक्त राष्ट्र सुधार पर सामूहिक दबाव बढ़ा सकते हैं। तीनों देशों की लोकतांत्रिक साख और उभरती अर्थव्यवस्थाएं इस दिशा में नैतिक और राजनीतिक जोर प्रदान कर सकती हैं।
