संपादकीय: सर्दियों का समाधान
उत्तर प्रदेश, बिहार। समेत कई राज्यों में तेज ठंड पड़ रही है, पश्चिमी विक्षोभों की तीव्रता में बदलाव, जेट स्ट्रीम का दक्षिण की ओर खिसकना, आर्कटिक क्षेत्र में तापमान असामान्य रूप से बढ़ना और इसके कारण ठंडी हवा का निचले अक्षांशों तक पहुंचना इसकी वजह है। जलवायु परिवर्तन के मौसम पर असामान्य प्रभाव के चलते अचानक और तीव्र ठंड अब अपवाद नहीं रही। इस सर्दी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केंद्र और राज्य सरकारें इस स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार हैं।
सच यह है कि अधिकांश उपाय प्रतिक्रियात्मक हैं। सर्दी बढ़ने के बाद अलाव, रैन बसेरे और कंबल वितरण शुरू होते हैं, जबकि दीर्घकालिक तैयारी का अभाव दिखता है। सर्दियों के साथ प्रदूषण का बढ़ना और श्वसन, हृदय तथा संक्रामक रोगों का प्रकोप एक जाना-पहचाना चक्र है। इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं की अग्रिम तैयारी, दवाओं की उपलब्धता, मोबाइल हेल्थ यूनिट और प्रदूषण नियंत्रण के कड़े कदम अपेक्षित हैं। उतर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों ने प्रयास किए हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यह अभी भी असमान है। सूबे में सरकार ने करोड़ों व्यय कर अपेक्षाकृत व्यापक प्रबंध किए हैं।
रैन बसेरों की संख्या बढ़ाना, शहरी व ग्रामीण इलाकों में अलाव की व्यवस्था, कंबल वितरण, अस्पतालों में विशेष वार्ड और आपात सेवाओं को अलर्ट पर रखना, स्कूलों में अवकाश। इनका असर खासतौर पर हाशिये पर रहने वाले लोगों, बेघर, वृद्ध, दिहाड़ी मजदूरों पर सकारात्मक पड़ सकता है, बशर्ते वितरण और निगरानी में लापरवाही न हो। पशुओं और मवेशियों के लिए अस्थायी शेड, चारा और पशु चिकित्सा सेवाओं की व्यवस्था भी जरूरी है, क्योंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा पशुधन पर निर्भर है।
सर्दियों का असर यातायात और व्यवसाय पर न पड़े कोहरे और शीतलहर के कारण सड़क व रेल दुर्घटनाएं न बढ़ें, इसके लिए बेहतर विजिबिलिटी सिस्टम, समय पर ट्रैफिक एडवाइजरी, रेल-सड़क समन्वय और कार्य समय में लचीलापन और जरूरी है। मानवाधिकार आयोग का निर्देश है कि ठंड से किसी बेघर की मृत्यु न हो, पर हर वर्ष देश में ठंड के असर से हजारों लोगों की मौत होती है। इन आंकड़ों को आपदा के रूप में दर्ज होना चाहिए। शीत लहर के लिए कोई सशक्त, मानकीकृत राष्ट्रीय कार्य योजना नहीं है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, स्थानीय निकाय और स्वास्थ्य विभाग को मिलकर सूचना साझा करने और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया मजबूत बनाने के लिए, यह करना आवश्यक है।
पूर्व नियोजित तैयारियों तथा विभागों के बीच समन्वय की कमी, धन का अक्षम उपयोग, डेटा और तकनीकी क्षमता के अभाव में स्थान और समय विशिष्ट योजनाओं को तैयार न कर पाना हर साल की इस मुसीबत से निबटने में विफलता के मुख्य बिंदु हैं। हमें प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में तकनीकी खामियां दूर कर स्थानीय भाषा में रियल-टाइम अलर्ट, पंचायत और शहरी वार्ड स्तर तक सूचना तंत्र और समुदाय-स्तरीय तैयारी को सालाना प्रक्रिया का हिस्सा बनाना होगा। उम्मीद है कि इस वर्ष की सर्दी से सबक लेकर सरकारें पूरे साल की योजना बनाएंगी।
