फड़ चित्रकला: लोकआस्था की जीवंत परंपरा

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Published By Anjali Singh
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फड़ चित्रकला राजस्थान की एक दुर्लभ और ऐतिहासिक लोककला है, जिसकी परंपरा लगभग 700 वर्षों से एक ही वंश में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। इसकी उत्पत्ति राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के पास स्थित शाहपुरा क्षेत्र में मानी जाती है। फड़ वस्तुतः एक विशाल स्क्रॉल पेंटिंग होती है, जिसमें स्थानीय देवी-देवताओं और लोकनायकों की विस्तृत धार्मिक कथाएं चित्रित की जाती हैं।

इन चित्रों को चलती-फिरती या ‘मोबाइल मंदिर’ के रूप में देखा जाता था। रबारी जनजाति के पुजारी-गायक, जिन्हें भोपा और भोपी कहा जाता है, इन्हें अपने साथ गांव-गांव ले जाते थे। वे देवनारायणजी (विष्णु के अवतार) और लोकनायक पाबूजी की वीर गाथाओं को गायन और कथा-प्रस्तुति के माध्यम से जीवंत करते थे। सूर्यास्त के बाद फड़ को खोला जाता था और यह प्रस्तुति पूरी रात चलती रहती थी। स्थानीय बोली में ‘फड़’ का अर्थ ‘मोड़ना’ होता है, जो इस कला के स्वरूप को भी दर्शाता है।

फड़ चित्रकला अत्यंत श्रमसाध्य और अनुशासनबद्ध प्रक्रिया से बनती है। इसे हाथ से बुने मोटे सूती कपड़े पर बनाया जाता है, जिसे पहले रातभर भिगोया जाता है ताकि धागे मजबूत हो सकें। इसके बाद चावल या गेहूं के आटे से बने स्टार्च से कपड़े को कड़ा किया जाता है, धूप में सुखाया जाता है और मूनस्टोन से रगड़कर सतह को चिकना व चमकदार बनाया जाता है।
 
इस कला की एक विशेषता इसका पूर्णतः प्राकृतिक होना है। रंग पत्थरों, फूलों, पौधों और जड़ी-बूटियों से तैयार किए जाते हैं। कलाकार इन्हें स्वयं बनाते हैं और गोंद व पानी के साथ मिलाकर कपड़े पर प्रयोग करते हैं। फड़ चित्रकला में पीला, नारंगी, हरा, भूरा, लाल, नीला और काला रंग प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। प्रत्येक रंग का प्रतीकात्मक उपयोग होता है- पीला प्रारंभिक रेखांकन और आभूषणों के लिए, नारंगी शरीर के अंगों के लिए, हरा वनस्पति के लिए, भूरा वास्तु संरचनाओं के लिए, लाल शाही वस्त्रों और सीमाओं के लिए, नीला जल व पर्दों के लिए, जबकि काला रंग अंत में रूपरेखा उभारने के लिए प्रयोग किया जाता है। 

इतनी सख्त पारंपरिक सीमाओं के कारण यह कला एक समय लुप्त होने की कगार पर पहुंच गई थी। ऐसे में प्रसिद्ध फड़ चित्रकार और पद्मश्री से सम्मानित श्री लाल जी जोशी ने 1960 में भीलवाड़ा में जोशी कला कुंज की स्थापना कर इस परंपरा को नया जीवन दिया। उन्होंने पहली बार परिवार के बाहर के कलाकारों को भी फड़ कला सिखाने का साहसिक कदम उठाया। उनके पुत्र गोपाल और कल्याण जोशी के नेतृत्व में यह प्रयास और विस्तृत हुआ और 1990 में इस संस्थान का नाम चित्रशाला रखा गया। आज तक चित्रशाला में 3,000 से अधिक कलाकार प्रशिक्षित हो चुके हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल कला को जीवित रखना नहीं, बल्कि उसकी पारंपरिक तकनीकों और प्राकृतिक रंगों की जटिल प्रक्रियाओं को भी संरक्षित करना रहा है।
 
फड़ चित्रकला केवल दृश्य सौंदर्य की कला नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोककथाओं, आस्था और सांस्कृतिक स्मृति का जीवंत दस्तावेज है। आधुनिक समय में ऐसी कलात्मक विरासतों को बढ़ावा देना आवश्यक है, क्योंकि यही भारत की लोकसंस्कृति और ऐतिहासिक चेतना को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाती हैं।