जिंदगी का सफर: भारत की पहली पिनअप गर्ल- बेगम पारा
सिनेमा के इतिहास में कुछ चेहरे सिर्फ पर्दे पर नहीं टिकते, वे समय की दीवारों पर छप जाते हैं। बेगम पारा ऐसा ही एक नाम हैं। भारत की पहली पिनअप गर्ल- एक ऐसा संबोधन, जो सिर्फ सौंदर्य का नहीं, बल्कि साहस और समय से आगे निकल जाने की कहानी कहता है। साल 1951 में दुनिया कोरिया युद्ध की आग में झुलस रही थी। उसी दौर में अमेरिका की प्रतिष्ठित लाइफ मैगजीन में एक भारतीय अभिनेत्री की तस्वीरें छपीं- बेगम पारा की। ये तस्वीरें भारतीय समाज के उस समय के मानकों के हिसाब से बेहद बोल्ड थीं।
भारत में वे पहले से जानी-पहचानी थीं, लेकिन लाइफ मैगजीन के बाद उनकी पहचान सरहदों से बाहर फैल गई। कहा जाता है कि कोरिया युद्ध में तैनात अमेरिकी सैनिक उनके इतने के दीवाने थे-हर बैरक में बेगम पारा की मुस्कान की तस्वीर टंगी मिलती थी। यहीं से जन्म हुआ-भारत की पहली पिनअप गर्ल का।
25 दिसंबर 1926 को झेलम में जन्मी बेगम पारा के पिता मियां अहसान-उल-हक न्यायधीश थे- आधुनिक सोच वाले, अनुशासनप्रिय। बार-बार तबादलों के कारण बेगम पारा की पढ़ाई अलीगढ़ के हॉस्टल में हुई। यहीं उनकी व्यक्तित्व की नींव पड़ी-आत्मविश्वास और स्वतंत्रता।
मुंबई की फिल्मी दुनिया में उनका प्रवेश संयोग नहीं, नियति जैसा था। भाभी प्रोतिमा दासगुप्ता स्वयं अभिनेत्री थीं। प्रभात पिक्चर्स के बाबूराव पै की नजर जब बेगम पारा पर पड़ी, तो 1944 की फिल्म चांद से उनका सफर शुरू हो गया। अगले पंद्रह वर्षों में उन्होंने लगभग 28 फिल्मों में काम किया- छमिया, झरना, पगले, शहनाज, सुहागरात- हर फिल्म में एक गरिमा, एक ठहराव। फिल्मों के बीच उन्हें प्रेम मिला नासिर खान के रूप में।
1958 में विवाह हुआ और इसके साथ ही उन्होंने स्वेच्छा से सिनेमा को अलविदा कह दिया। यह निर्णय ग्लैमर से नहीं, आत्मिक संतोष से लिया गया था। जीवन ने आगे कठिन इम्तिहान लिए। पति का असामयिक निधन, अधूरी फिल्म, आर्थिक संकट सब कुछ सहते हुए भी बेगम पारा टूटी नहीं। पाकिस्तान गईं, लेकिन वहां की रूढ़िवादिता उन्हें रास नहीं आई। वे लौट आईं- अपने देश, अपनी मिट्टी में। करीब पचास साल बाद सांवरिया में उनकी संक्षिप्त वापसी मानो इतिहास का नमन था। 10 दिसंबर 2008 को बेगम पारा इस फानी दुनिया से फना चली गईं, लेकिन एक तस्वीर, एक दौर और एक दास्तान हमेशा के लिए छोड़ गईं।
