शुभ मंगल और कल्याण का प्रतीक स्वास्तिक

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Published By Anjali Singh
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भारतीय संस्कृति में प्रतीकों का बड़ा महत्व है। यह प्रतीक अपने भीतर अनेक रहस्यों को समेटे रहते हैं, लेकिन इनका रहस्य वही जान सकता है, जो संस्कृति के इन प्रतीकों को गहराई से जानता एवं समझता हो। शेष लोगों के लिए प्रतीक केवल प्रतीक जैसे ही होते हैं। भारतीय संस्कृति में ‘स्वास्तिक’ भी एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। इसे सूर्य का प्रतीक माना जाता है। वैसे भारतीय संस्कृति में स्वास्तिक के अनगिनत आयाम हैं और इसे तरह-तरह से अभिव्यक्त किया गया है। स्वास्तिक का सामान्य अर्थ आर्शीवाद देने वाला, मंगल या पुण्य कार्य करने वाला है। यह शुभ या मांगलिक कार्यो एवं पुण्यकृतियों की स्थापना के रूप में प्रकट किया जाता है।  -पं. मनोज कुमार द्विवेदी ज्योतिषाचार्य, कानपुर

स्वास्तिक का प्रतीक ‘ॐ’

स्वास्तिक का अर्थ, ऐसे अस्तित्व से है, जो शुभ भावना से सराबोर हो, कल्याणकारी हो, मंगलमय हो, जहां अशुभता, अमंगल एवं अनिष्ट का लेश मात्र भय न हो। स्वास्तिक का अर्थ है ऐसी सत्ता, जहां केवल कल्याण एवं मंगल की भावना ही निहित हो, जहां औरों के लिए शुभ भावना सन्निहित हो। इसलिए स्वास्तिक को कल्याण की सत्ता और उसके प्रतीक के रूप में निरूपित किया जाता है। विघ्नहर्ता श्रीगणेश जी की प्रतिमा की भी स्वास्तिक चिह्न से संगति है। श्रीगणेश जी के सूड़, हाथ, पैर, सिर आदि अंग इस तरह से चित्रित होते हैं कि यह स्वास्तिक की चार भुजाओं के रूप में प्रतीत होते हैं। ‘ॐ’ को भी स्वास्तिक का प्रतीक माना जाता है। ‘ॐ’  ही सृष्टि के सृजन का मूल है, इसमें शक्ति, सामर्थ्य एवं प्राण सन्निहित हैं। ईश्वर के नामों में सर्वोपरि मान्यता इसी अक्षर की है। अतः स्वास्तिक ऐसा प्रतीक है, जो सर्वोपरि भी है और शुभ एवं मंगल दायक भी है। 

मंगलाचरण के लिए महत्वपूर्ण स्वास्तिक 

स्वास्तिक को शास्त्रों में शुभ एवं कल्याणकारी बताया गया है। प्राचीन काल में हमारे यहां कोई भी श्रेष्ठ कार्य करने से पूर्व मंगलाचरण लिखने की परंपरा थी। यह मंगलाचरण सभी के लिए लिखना संभव नहीं था, परंतु सभी इस मंगलाचरण का महत्व जानते थे एवं उसका लाभ भी लेना चाहते थे। इसलिए ऋ षियों ने स्वास्तिक चिह्न की परिकल्पना की, जिससे सभी के कार्य मंगलप्रद ढंग से संपन्न हो सकें। धार्मिक और मांगलिक कार्यों में वेदी पर चावल आदि से स्वास्तिक को उकेरना मंगलमय माना जाता है।

सकारात्मक उर्जा में वृद्धि करता

स्वास्तिक जहां भी बनाया जाता है, वहां की नकारात्मक उर्जा को नष्ट करता है। ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा की धारा को अपनी ओर आकर्षित करने की इसमें अद्भभुत क्षमता है। इसी को आधार मानकर स्वास्तिक को अलग-अलग वस्तुओं से बनाया जाता है, जिनके अलग-अलग अर्थ होते हैं। जैसे सिंदूर या अष्टगंध से निर्मित स्वास्तिक शुभ और सात्विक माना जाता है। स्वास्तिक जहां भी होता है, नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करता है और सकारात्मक उर्जा में वृद्धि करता है। इस तरह स्वास्तिक एक श्रेष्ठ एवं मंगलप्रद प्रतीक है, जो सदा कल्याणकारी होता है।

प्राचीन काल से दुनिया की कई संस्कृतियों में प्रमाण

स्वास्तिक को एक प्राचीन वैश्विक प्रतीक भी माना जाता है। हजारों वर्षों से दुनिया की कई संस्कृतियों में इसके प्रमाण मिलते रहे हैं। भारतीय संस्कृति में हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में स्वास्तिक को सौभाग्य और मंगल का प्रतीक माना गया है। हिंदू धर्म में यह सूर्य, भगवान विष्णु, ‘ॐ’  और ब्रह्मांड का प्रतीक है। बौद्ध धर्म में बुद्ध के पदचिह्न और जैन धर्म में यह 24 तीर्थंकरों में से एक का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय उपमहाद्वीप में सिंधु घाटी सभ्यता से पहले इसके साक्ष्य मिलते हैं। 3,000 ईसा पूर्व की मोहरों में स्वास्तिक चिह्न पाया गया है। इस प्रकार स्वास्तिक एक सार्वभौमिक प्रतीक है, जो विभिन्न संस्कृतियों में शुभता और कल्याण के लिए उपयोग किया जाता रहा है, जबकि भारत में इसका विशेष आध्यात्मिक महत्व है।