पौराणिक कथा: तपस्या के साए में जन्मी सवारी

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Published By Anjali Singh
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शेर के मां दुर्गा का वाहन बनने की कथा भारतीय पौराणिक परंपरा में तप, त्याग और करुणा की अद्भुत मिसाल है। इस कथा का आरंभ उस समय होता है, जब माता पार्वती भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक घोर तपस्या में लीन रहती हैं। हिमालय की कठोर जलवायु, एकांत और निरंतर साधना उनके संकल्प को और दृढ़ बना देती है। अंततः उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भोलेनाथ उन्हें अपनी अर्धांगिनी स्वीकार करते हैं। कठोर तपस्या के कारण माता पार्वती का शरीर और रंग रूप बदल जाता है। एक दिन सहज संवाद में भगवान शिव उन्हें “काली” कह देते हैं। यह शब्द माता के मन को गहराई से आहत करता है।

आत्मसम्मान और आत्मबोध से प्रेरित होकर वे पुनः वन की ओर प्रस्थान करती हैं और पहले से भी अधिक कठोर तप करने लगती हैं, ताकि वे अपने पूर्ववत गौर स्वरूप को पुनः प्राप्त कर सकें। उसी वन में एक शेर भटकते-भटकते वहाँ आ पहुँचता है। देवी को देखकर उसके भीतर उन्हें भोजन बनाने की इच्छा जागती है, पर जैसे ही वह समीप जाता है, माता की तपस्या से उत्पन्न दिव्य तेज उसे रोक देता है। भय और श्रद्धा के मिश्रित भाव से वह हर बार पीछे हट जाता है। दिन बीतते जाते हैं, वर्ष गुजर जाते हैं, पर शेर प्रतीक्षा नहीं छोड़ता। भूखा-प्यासा, वह एक कोने में बैठकर माता के तप पूर्ण होने की बाट जोहता रहता है। अनजाने में वह भी उसी तप का सहभागी बन जाता है।

माता पार्वती की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर अंततः भगवान शिव प्रकट होते हैं और उन्हें वर माँगने को कहते हैं। माता विनम्रता से अपने गौर वर्ण की कामना प्रकट करती हैं। भगवान शिव उनका वरदान पूर्ण करते हैं। स्नान के समय माता के शरीर से कौशिकी देवी का प्राकट्य होता है और तप से उत्पन्न काला रंग विलीन हो जाता है। तभी से माता पार्वती “माँ गौरी” के नाम से विख्यात होती हैं। स्नान के उपरांत जब माता वन से बाहर आती हैं, तो उनकी दृष्टि उस शेर पर पड़ती है, जो अब भी भूखा, थका हुआ और शांत भाव से एक ओर बैठा था। 

उसका धैर्य और प्रतीक्षा माता के हृदय को द्रवित कर देती है। वे भगवान शिव से कहती हैं—“नाथ, जितना तप मैंने किया, उतना ही इस शेर ने भी मेरे साथ सहन किया है। इसने मेरे तप की मर्यादा रखी है।” माता की करुणा से प्रसन्न होकर भगवान शिव शेर को उनका वाहन बना देते हैं। तभी से माता शेर पर आरूढ़ होकर माँ दुर्गा, माँ शेरावाली के रूप में पूजित हुईं—जहाँ शेर शक्ति और साहस का प्रतीक है और माता उस शक्ति की नियंत्रक करुणामयी अधिष्ठात्री।