संपादकीय: यह हिंसा कैसे रुकेगी

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
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बीते 19 दिनों में बांग्लादेश में छह हिंदुओं की हत्या, व्यापक हिंसक दुर्व्यवहार और संगठित अपराध की घटनाएं भारत के लिए सीमापार में मानवीय संकट तो है ही, उसके लिए यह सीधी चुनौती है। इससे सीमा पार अप्रवासन, सांप्रदायिक तनाव और कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है। धर्म निरपेक्ष कहलवाने वाले बांग्लादेश के लिए भी यह उसकी लोकतांत्रिक, अंतर्राष्ट्रीय बहुलतावादी साख की गंभीर परीक्षा है।

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा किसी भी आधुनिक राज्य की बुनियादी जिम्मेदारी होती है। इसमें चूक पड़ोसियों की सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और अंतर्राष्ट्रीय भरोसे को डगमगाती है। चुनावी मौसम में हिंदुओं के विरुद्ध हिंसा की तेज़ी के पीछे कई वजहें हैं, जैसे चुनावी ध्रुवीकरण, कट्टरपंथी नेटवर्कों का उभार, दंडहीनता की संस्कृति और प्रशासनिक शिथिलता। स्थानीय नेता, कारोबारी, अधिकारी, पत्रकार, छात्र और महिलाएं, हर वर्ग के हिंदुओं का हिंसा की चपेट में आना बताता है कि समस्या केवल धार्मिक नहीं, गहरे राजनीतिक उपयोग से भी जुड़ी है। 

पहचान को ‘वोट-ब्लॉक’ या ‘विरोधी खेमे’ के रूप में चिन्हित कर भय का वातावरण बनाना आसान हो जाता है। हिंदुओं पर हिंसा की तेजी से वृद्धि के पीछे राजनीतिक अस्थिरता प्रमुख है। यह घृणा धार्मिक दिखती है, मगर जड़ें राजनीतिक हैं। नफरत का बीज जेहादी संगठनों और कट्टर राजनीति ने बोया है, जिसे सरकारें अनदेखा करती रहीं। अल्पसंख्यकों को वोट बैंक के रूप में कुचलना और हिंदुओं को राजनीति की मुख्यधारा से बाहर रखना, उनकी आवाज को मंच न देकर दबा देना प्रछन्न नीति रही है। 

चुनावों में सुरक्षा बढ़ती है, ऐसी घटनाएं बताती हैं कि या तो व्यवस्था की इच्छाशक्ति कमजोर है या चरमपंथी दबावों के आगे वह झुक रहा है। यह इशारा करता है कि हिंसा राज्य प्रायोजित हिंसा है। यहां पहले भी ऐसी हिंसा होती रही है। 2001 के चुनाव बाद हिंदुओं पर व्यापक अत्याचार हुए, तब भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाया था। उसने राजनयिक दबाव बनाया, आर्थिक सहायता रोकी। 2024 में शेख हसीना के इस्तीफे के बाद 4 से 20 अगस्त तक 2010 से अधिक हमले हुए। मंदिर जलाए गए, घर लूटे गए। पर कूटनीतिक दबाव, सार्वजनिक-निजी संवाद और सीमा-स्तरीय सहयोग के जरिए मात्र चिंता जताई गई। उतनी कड़ाई नहीं बरती गई, जितना बरतना चाहिए था। सरकार के कदम अपर्याप्त प्रयासों के चलते त्वरित अभियोजन और संरचनात्मक सुधार नहीं हो सके। 

कुछ हफ्ते पहले संघ प्रमुख ने कहा था, एकमात्र हिंदू बहुल देश भारत को सीमाओं में रहकर बांग्लादेश के हिंदुओं की अधिकतम मदद करनी चाहिए, जिसका आशय था बांग्लादेश पर दबाव, बहुपक्षीय मंचों पर मुद्दा उठाना, मानवीय सहायता और शरण-संबंधी संवेदनशीलता, लेकिन इस आह्वान के बाद फिलहाल इस ओर कोई ठोस कदम नहीं दिखा। न आश्रय, न वैश्विक मंच पर मुखरता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद जो पहली घटना के बाद वैश्विक अभियान चलाने की बात कह रहे थी, उनकी भूमिका जनमत-संगठन, राहत और अंतर्राष्ट्रीय जागरूकता तक ही सीमित रह सकती है। वे विदेश नीति का स्थानापन्न नहीं बन सकते।