यूपी पंचायत चुनाव : भाजपा में 14 जिलाध्यक्षों पर अब भी सस्पेंस, संगठन को नहीं मिल पा रहा फाइनल फॉर्मूला 

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Published By Anjali Singh
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लखनऊ, अमृत विचार: पंचायत और विधानसभा चुनाव की तैयारियों में पूरी ताकत झोंक चुकी भारतीय जनता पार्टी का संगठनात्मक गणित फिलहाल अटका हुआ है। 10 माह के लंबे मंथन के बाद भी प्रदेश के 98 संगठनात्मक जिलों में से 14 जिलाध्यक्षों के नाम तय नहीं हो सके हैं। चुनावी मोड में दौड़ रही पार्टी के लिए यह देरी अंदरूनी संतुलन की चुनौती को उजागर कर रही है। एक ओर पार्टी पर सामाजिक-जातीय समीकरण साधने का दबाव है, तो दूसरी ओर सांसदों-विधायकों की पसंद भी फैसले को प्रभावित कर रही है। 

जनप्रतिनिधि अपने भरोसेमंद चेहरों को जिलाध्यक्ष बनवाने में जुटे हैं, जबकि संगठन सभी क्षेत्रों में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। यही खींचतान नामों की घोषणा में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। पिछले वर्ष मार्च और नवंबर में दो चरणों में जिलाध्यक्षों की सूची जारी की गई थी, लेकिन इसके बावजूद सभी छह क्षेत्रों के हर जिले में सहमति नहीं बन पाई। 2024 के लोकसभा चुनाव में अपेक्षित परिणाम न आने के बाद कई जिलों में संगठनात्मक बदलाव की मांग तेज हुई थी। इसी पृष्ठभूमि में पार्टी ने पीडीए राजनीति का तोड़ तलाशते हुए अनुभव और जातीय संतुलन को आधार बनाकर नियुक्तियां कीं, मगर 14 जिलों पर फैसला टलता चला गया।

अब 2027 विधानसभा चुनाव की आहट के साथ दबाव और बढ़ गया है। अवध, पश्चिम, ब्रज, काशी और गोरखपुर लगभग हर क्षेत्र में कहीं दो पारी खेल चुके नेताओं को दोहराने या बदलाव करने को लेकर मतभेद हैं, तो कहीं जातीय समीकरण नई उलझन खड़ी कर रहे हैं। कहीं ब्राह्मण-ओबीसी संतुलन पर चर्चा है, तो कहीं ठाकुर, कुर्मी, जाट, गुर्जर और कश्यप जैसे सामाजिक समूहों की दावेदारी सामने है।

अवध क्षेत्र में कुछ जिलों में पुराने चेहरों की वापसी और नए सामाजिक कार्ड पर मंथन चल रहा है। पश्चिमी यूपी में पहले से प्रभावी जातियों के बजाय नए वर्गों को अवसर देने की मांग उठी है। ब्रज और काशी क्षेत्र में भी जिलाध्यक्षों को लेकर सहमति बनाने के लिए लगातार फीडबैक लिया जा रहा है, जबकि गोरखपुर क्षेत्र के कुछ जिलों में जातीय गणित निर्णायक भूमिका निभा रहा है। पार्टी नेतृत्व का दावा है कि नए प्रदेश अध्यक्ष की कमान संभालने के बाद प्रक्रिया को गति मिली है और जनवरी के अंत तक शेष जिलों में भी अध्यक्ष घोषित कर दिए जाएंगे। हालांकि, मौजूदा हालात बताते हैं कि पसंदीदा चेहरों और सामाजिक संतुलन के बीच सही फॉर्मूला तलाशना अब भी संगठन के लिए सबसे बड़ी कसौटी बना हुआ है।


इन 14 जिलों में अटकी है जिलाध्यक्षों की ताजपोशी

अवध क्षेत्र

• अयोध्या: संजीव सिंह (पूर्व जिलाध्यक्ष) व कमलेश श्रीवास्तव (महानगर अध्यक्ष) की दावेदारी;

ब्राह्मण बनाम अनुसूचित वर्ग के समीकरण पर मंथन

• अंबेडकरनगर: त्रयंबक त्रिपाठी को दोहराने या कुर्मी चेहरे को मौका देने पर रस्साकशी
• लखीमपुर: दो पारी खेल चुके सुनील सिंह (ठाकुर); ओबीसी वर्ग का दबाव
• गोंडा: पूर्व कश्यप अध्यक्ष हटने के बाद ब्राह्मण बनाम ओबीसी संतुलन पर विचार

पश्चिम क्षेत्र

• शामली: जाट कोटे से अध्यक्ष रहे तेजेंद्र निर्वाल के बाद

ठाकुर, कश्यप व पाल वर्ग की दावेदारी

• सहारनपुर: महेंद्र सैनी को दोहराने या ठाकुर–गुर्जर कार्ड खेलने की बहस
• अमरोहा: मौजूदा अध्यक्ष उदय गिरी गोस्वामी के स्थान पर
जाट–गुर्जर समीकरण पर चर्चा

ब्रज क्षेत्र

• पीलीभीत: संजीव प्रताप सिंह (दो पारी) के बाद बदलाव के संकेत

काशी क्षेत्र

• वाराणसी (जिला): जातीय संतुलन व संगठनात्मक फीडबैक पर सहमति नहीं
• चंदौली: ओबीसी बनाम सवर्ण संतुलन पर अटका फैसला
• मीरजापुर: स्थानीय जनप्रतिनिधियों की पसंद को लेकर मतभेद
गोरखपुर क्षेत्र
• सिद्धार्थनगर: अल्पसंख्यक–ओबीसी संतुलन पर विचार
• देवरिया: ब्राह्मण बनाम पिछड़ा वर्ग के बीच फंसा निर्णय

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