संपादकीय : ट्रंप का टैरिफ टूल
अमेरिकी कांग्रेस में प्रस्तावित 500 प्रतिशत टैरिफ वाला विधेयक वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने वाला जियो-इकोनॉमिक औज़ार बनता दिख रहा है। यह सीनेट से पास हो जाएगा, पर इसको लेकर डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर मतभेद और रिपब्लिकन पार्टी के कई सांसदों की नाराजगी के चलते इसके कांग्रेस से पारित होने की राह किंचित कठिन हो सकती है। फिर ट्रंप के टैरिफ थोपने को लेकर अदालती फैसला भी आने ही वाला है।
ट्रंप के लिए टैरिफ महज़ व्यापारिक हथियार नहीं, बल्कि ‘स्विस मिलिट्री नाइफ’ की तरह बहुउद्देशीय औज़ार है— आर्थिक सौदेबाज़ी, कूटनीतिक दबाव, जियो-पॉलिटिकल इशारे और यहां तक कि सुरक्षा रणनीति का हिस्सा भी, लेकिन यही बहूपयोगिता इसे विवादास्पद भी बनाती है। 500 प्रतिशत जैसा अतिरेकी टैरिफ विश्व व्यापार संगठन के नियमों की भावना के विपरीत है। इसके लिए उसे कानूनी चुनौतियों और अंतर्राष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ सकता है। इस विधेयक के तहत रूसी मूल के तेल, पेट्रोलियम उत्पाद या यूरेनियम की खरीद और कारोबार करने वाले देशों पर भी 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की बात कही गई है। भारत और चीन इस दायरे में आते हैं।
ट्रंप चीन के साथ व्यापार घटाना चाहते हैं, लेकिन इस प्रावधान और अमेरिकी चाहत के चलते भारत ज्यादा निशाने पर है, क्योंकि अमेरिका भारत पर कृषि और डेयरी बाज़ार खोलने का दबाव बनाकर, चीन के साथ घटे व्यापार की भरपाई करना चाहता है। भारत के लिए इसके निहितार्थ गहरे हैं। ऐसा टैरिफ भारत की ऊर्जा नीति, व्यापार संरचना, रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक स्थिति को सीधे प्रभावित करेगा। रूसी क्रूड पर निर्भर भारतीय रिफाइनरियों के मार्जिन दबाव में आ सकते हैं और यदि मिडिल ईस्ट या अन्य स्रोतों से महंगा तेल खरीदना पड़ा, तो घरेलू ईंधन कीमतों में उछाल तय है।
निर्यात के मोर्चे पर, 500 प्रतिशत टैरिफ का अर्थ होगा कि अमेरिकी बाज़ार में भारतीय उत्पाद लगभग अप्रतिस्पर्धी हो जाएंगे विशेषकर टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी, केमिकल्स और इंजीनियरिंग गुड्स जैसे क्षेत्रों में, हालांकि भारत ने जोखिम को भांपते हुए बाज़ार विविधीकरण की रणनीति अपनाई है। दिलचस्प यह है कि इतना कठोर टैरिफ भारत या चीन से अधिक अमेरिकी अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचा सकता है। इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा, उद्योगों की लागत बढ़ेगी और रोज़गार पर दबाव आएगा। यही कारण है कि 500 प्रतिशत टैरिफ की बात को राजनीतिक बयानबाज़ी अधिक मालूम होती है और इसके लागू होने की संभावना कम।
यदि अदालतें इसके खिलाफ जाती हैं, तो इसकी वैधता पर वैसे भी प्रश्नचिह्न लग जाएगा। इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा रिपोर्ट का उल्लेख उत्साहजनक है, जिसके अनुसार 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा। यह संकेत देता है कि भारत की आर्थिक बुनियाद मज़बूत है। 50 प्रतिशत टैरिफ भारत की रफ्तार नहीं रोक सका, तो 500 प्रतिशत जैसे अतिरेकी कदम से भी भारत उबरने की क्षमता रखता है— बशर्ते नीति-निर्माण में सतर्कता, कूटनीतिक संतुलन और बाज़ार विविधीकरण की रणनीति बनी रहे।
