संपादकीय: उबाल बिंदु पर ईरान
ईरान में आर्थिक संकट, सामाजिक आक्रोश और भू-राजनीतिक दबाव सब एकजुट हो गए हैं। तेहरान के बाजारों में महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ विरोध अब देशव्यापी उग्र आंदोलन है। 2022 के प्रदर्शनों की तुलना में मौजूदा यह ज्यादा जटिल और खतरनाक हैं। तब आंदोलन मुख्यतः सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों तक सीमित थे, आज अर्थव्यवस्था, शासन, विदेश नीति और सत्ता संरचना इत्यादि सब एक साथ सवालों के घेरे में हैं।
ईरान पहले से ही इजराइल के साथ छद्म युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों, गिरती मुद्रा, बिजली–पानी की भारी किल्लत और बेरोजगारी से जूझ रहा है। सरकार के भीतर मतभेद स्थिति को और उलझा रहे हैं। राष्ट्रपति मसूद पजशकियान सार्वजनिक रूप से नरमी और संवाद की बात करते हैं, जबकि सुरक्षा प्रतिष्ठान और कई मंत्री आंदोलनकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के पक्षधर हैं। यह द्वंद्व बताता है कि सत्ता तंत्र में नीति-समन्वय की कमी है, यह संकट प्रबंधन को कमजोर बनाती है।
2026 के बजट में 62 प्रतिशत टैक्स बढ़ाने, दवाओं और उपभोक्ता वस्तुओं के दाम आसमान छूने से जनता भड़की, तो सरकार समाधान की बजाए इसे अमेरिका और इजराइल से जोड़कर बाहरी साजिश बताने लगी। देशभर में जेन-जी का आक्रोश सामने आया, जिसकी वजह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि धार्मिक-सामाजिक पाबंदियों, अवसरों की कमी और भविष्य की अनिश्चितता भी हैं। बढ़ते आंदोलन को निर्वासित शाही परिवार के उत्तराधिकारी रजा पहलवी के समर्थन ने राजनीतिक रंग दे दिया और आंदोलन की आंच सता तक आई, तो सरकार ने हर महीने सभी को लगभग 7 डॉलर की नकद मदद की बात की, जो राहत भीषण महंगाई के सामने नाकाफी थी।
प्रदर्शनकारियों को “विदेश समर्थित दंगाई” बताकर आर्थिक मांगों और सत्ता परिवर्तन की मांग करने वालों में विभाजन की कोशिश की जो उलटी पड़ी। इससे अविश्वास बढ़ा और आंदोलन अधिक उग्र और स्थिति और विस्फोटक बन गई। ईरान सचमुच “उबाल के बिंदु” पर है? निकट भविष्य में बड़े घटनाक्रम की आशंकाएं हैं। तख्ता पलट, गृहयुद्ध या किसी बाहरी हमले की आशंका अगर कुछ दूर भी हो पर जोखिम बना हुआ हैं, इजराइल ने संभावित हस्तक्षेप पर “इंतजार” और अमेरिका को पहल देने की बात उसकी रणनीतिक धैर्य नीति को दर्शाता है या नीति-शून्यता को तय करना होगा।
ऐसे आंकड़ों की पुष्टि कठिन होती है, पर मानवाधिकार संगठनों द्वारा दर्जनों मौतों के दावों को पूरी तरह खारिज नहीं कर सकते। सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई द्वारा अमेरिका को दोष देना घरेलू एकजुटता बनाए रखने की अपील पुरानी रणनीति है। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की सैन्य धमकियां अधिकतर राजनीतिक दबाव का औजार लगती हैं, प्रत्यक्ष बड़े हवाई हमले की आशंका फिलहाल सीमित दिखती है। भारत के लिए चिंता व्यावहारिक है- ईरान में लगभग 10,000 भारतीय नागरिक हैं। केवल एडवाइजरी पर्याप्त नहीं, दूतावास की सक्रिय निगरानी, वैकल्पिक निकासी योजनाएं और स्थानीय संपर्क तंत्र मजबूत करना आवश्यक है। भारत को ईरान के संदर्भ में रणनीतिक संतुलन बनाए रखना चाहिए। ईरान मसले की ऐसी विकट स्थिति में शांति, संवाद और नागरिकों की सुरक्षा-यही भारत का विवेकपूर्ण रुख होना चाहिए।
