संपादकीय : उद्यम सृजक प्रदेश  

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
On

उत्तर प्रदेश को आत्मनिर्भर और उद्यमशील राज्य बनाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा आगामी पांच वर्षों में 15 लाख नए उद्यम स्थापित करने की योजना प्रदेश की आर्थिक संरचना को जमीनी स्तर पर बदलने का महत्वाकांक्षी प्रयास है। यदि यह योजना कागज से निकलकर धरातल पर उतरी, तो उत्तर प्रदेश की पहचान केवल श्रम-आपूर्तिकर्ता राज्य की नहीं, बल्कि उद्यम सृजक प्रदेश की बन जाएगी।

ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर स्वरोजगार को बढ़ावा देने और एक करोड़ ग्रामीण उद्यमी तैयार करने की रणनीति, आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को गांवों तक ले जाती है। ऐसे प्रदेश की जिसकी बड़ी आबादी कृषि आधारित अस्थिर और सीमित आय पर निर्भर हो, उद्यमिता को आजीविका का विकल्प बनाना, ग्रामीणों को स्वावलंबी बनाने की दिशा में निर्णायक कदम हो सकता है। प्रत्येक स्वयं सहायता समूह से कम से कम एक को उद्यम हेतु प्रोत्साहन और उन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से सीधे जोड़ने का प्रयास अत्यंत दूरदर्शी है। 

ग्रामीण उद्यमिता का यह मॉडल पलायन रोकने, स्थानीय रोजगार बढ़ाने और समावेशी विकास को गति देने में निर्णायक भूमिका निभाएगा। 5 लाख ग्रामीण महिलाओं को उद्यमिता से जोड़ने का लक्ष्य महिला सशक्तिकरण की दिशा में क्रांतिकारी कदम है। इसका उनके आय, निर्णय-क्षमता और सामाजिक सम्मान, तीनों स्तरों पर इसका प्रभाव पड़ेगा। “आत्मनिर्भर गांव, सशक्त महिलाएं” का सपना तभी साकार होगा, जब महिलाओं के उद्यमों को बाजार, वित्त और तकनीक, तीनों का भरोसेमंद सहारा मिले। योजना में कृषि आधारित आजीविका के साथ-साथ गैर-कृषि क्षेत्रों जैसे खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, डेयरी, सिलाई-कढ़ाई, स्थानीय उत्पादों की पैकेजिंग और मार्केटिंग को भी शामिल करने से गांवों में आय के स्थायी स्रोत विकसित होंगे और कृषि पर निर्भरता का दबाव घटेगा। 

हालांकि कुछ अहम पहलों की प्रगति पर सवाल भी हैं। ‘गांव की गाय, गांव की तरक्की’ के तहत और पतंजलि योगपीठ के साथ समझौते के साथ निराश्रित गायों से पंचगव्य, उनके गोबर से बायोप्लास्टिक, बायोगैस, कम्पोस्ट, नैनो सेल्यूलोज, स्किन केयर, वाहन ईंधन जैसे कई उत्पादों के लक्ष्य तय हुए, ताकि रोजगार बढ़े और ग्रामीणों की आर्थिक समृद्धि भी पर इसकी जमीनी उपलब्धियां बेहद सीमित दिखती हैं। पंचगव्य और प्राकृतिक खेती की योजनाएं घोषित हुईं, लेकिन अयोध्या, गोरखपुर, वाराणसी जैसे केंद्रों पर अपेक्षित गति नहीं दिखी। इसी तरह, चार गाय, मनरेगा के तहत टीनशेड और बायोगैस संयंत्र देने के वादे अभी व्यापक असर नहीं दिखा पाए हैं। 

तकरीबन हर तीसरे महीने ग्रामीण उद्यमिता से संबंधित घोषित होने वाली योजनाएं बेशक संभावनाओं से भरी हैं, परंतु इनके परिणामों का नियमित मूल्यांकन जरूरी है। घोषणाओं के साथ उनकी समयबद्ध समीक्षा, पारदर्शी डेटा और सुधारात्मक प्रयास भी आवश्यक हैं। पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीण उद्यमिता और रोजगार की तस्वीर बदली है, क्रियान्वयन, मूल्यांकन और जवाबदेही अगर प्राथमिकता बन जाए, वित्त, कौशल, बाजार और निगरानी पर एकसाथ काम हो तो बेशक सूबे के गांव मजबूत होंगे और साथ ही प्रदेश और देश भी। यह सब हो सका तो 2047 तक निस्संदेह विकसित उत्तर प्रदेश, उत्तम प्रदेश का सपना साकार हो जाएगा।