घुघुतिया पर्व: लोकसंस्कृति और उत्तरायणी की आत्मा 

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Published By Anjali Singh
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‘काले कौवा आ ले घुघुति माला खा ले- घुघुति माला खा ले’ कभी ये आवाज उत्तराखंड के सुदूर ग्रामीण अंचलों, उत्तराखंड के विकसित क्षेत्रों सहित प्रत्येक उत्तराखंडी परिवार  का बहुत ही लोकप्रिय गीत हुआ करता था। प्रत्येक उत्तराखंडी परिवार चाहे वो प्रदेश में अथवा देश के किसी भी कोने रहता हो। इस घुघुतिया त्योहार को बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। यह कुमाऊं क्षेत्र में अत्यंत लोकप्रिय त्योहार है, जिसे उत्तराखंड में उत्तरायणी त्योहार के साथ मनाया जाता है।

घुघुतिया त्योहार मुख्य रूप से कुमाऊं क्षेत्र में बहुत ही प्रचलित है, उत्तराखंड में उत्तरायणी का त्योहार धार्मिक मान्यता लिए हुए है। बागेश्वर में प्रति वर्ष उत्तरायणी मेले का आयोजन होता है, जो एक सप्ताह तक चलता है। यह उत्तराखंड के क्षेत्र का अत्यंत श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला त्योहार माना जाता है। आज भी उत्तराखंड के लोग गांव हों या भारत वर्ष में कहीं, जहां उत्तराखंडी प्रवासी बंधु रहते हैं, उत्तरायणी के त्योहार को बड़ी ही धूमधाम से मनाते है।- मोहन सिंह बिष्ट 

उत्तरायणी त्योहार पूरे उत्तराखंड का लोकप्रिय त्योहार है। इसका धार्मिक महत्व भी है। कहते हैं अयोध्या में जब प्रभु श्रीराम का भव्य राजतिलक का आयोजन हो रहा था, तो इस भव्य आयोजन में सम्मिलित होने के लिए जगत पिता ब्रह्मा जी भगवान विष्णु की मानस पुत्री सरयु देवी को अपने साथ अयोध्या लेकर जा रहे थे तभी मार्ग में मार्कण्डेय ऋ षि का आश्रम पड़ा। मार्कण्डेय ऋ षि एक वृक्ष के नीचे साधना कर रहे थे। यह देखकर सरयू रुक गईं और मार्ग में ऋ षि के बैठने से उत्पन्न बाधा के कारण व्याकुल होने लगीं।

यह देखकर माता पार्वती को उन पर दया आ गई, उन्होंने भगवान शिव की ओर उनकी सहायता हेतु देखा, तो भोलेनाथ ने लीला रची, उन्होंने एक व्याघ्र का रूप धारण कर लिया और माता पार्वती गोमाता रूप धरकर लीला करने लगे। व्याघ्र गाय की ओर झपटा   उससे मार्कंडेय जी ध्यान टूटा और वो गोमाता की रक्षा हेतु मार्ग से हट गए। देवी सरयू प्रसन्न होकर अपने मार्ग से बहकर आगे बढ़ गईं, जिस स्थान पर भगवान शिव ने व्याघ्र का रूप धरा था, उस स्थान 

ऋ षि मार्कण्डेय द्वारा भगवान व्याघ्रेश्वर महादेव को शिवलिंग के रूप में स्थापित किया उन्हीं के नाम पर व्याघेश्वर से धीरे-धीरे अपभ्रंश होकर, उस स्थान का नाम बागेश्वर पड़ा। उसी स्थान पर पवित्र गोमती नदी और मान्यता है कि लुप्त सरस्वती नदी की धारा भी बहती थी। इससे तीनों पवित्र नदियों का संगम होने के कारण यह स्थान और भी पवित्र हो गया।

इस दिन को समस्त जनमानस नदी के पवित्र जल में स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा आराधना करने लगा। धीरे-धीरे इस स्थान पर दूर-दूर से श्रद्धालु आकर पूजा-अर्चना करने लगे तथा स्नान ध्यान और दान इत्यादि से सभी प्रकार कष्टों मुक्त होने की भावना से एकत्र होने लगे। इस स्थान का महत्व बढ़ता गया। उत्तरायणी प्रमुख रूप से मकर संक्रांति का त्योहार ही है। उत्तराखंड में भी यह कुमाऊं क्षेत्र में घुघुति त्योहार और गढ़वाल क्षेत्र में खिचड़ी संक्रांति के नाम से मनाया जाता है और पूरे उत्तराखंड में यह बहुत ही लोकप्रिय त्योहार है। इस दिन लोग प्रातः काल नदी में स्नान करके सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं और उनकी उपासना करते हैं तथा खिचड़ी का दान भी करते हैं।  

प्रचलित पौराणिक कथा

उत्तराखंड में घुघुतिया त्योहार के पीछे स्थानीय कथा प्रचलित है कि कुमाऊं क्षेत्र में राजा कल्याण चंद का शासन था, उनके कोई संतान नहीं थी। ईश्वर की आराधना करने के बाद, उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम निर्भय चंद था, जिसे प्यार से रानी घुघुतिया कहकर बुलाती थी। घुघुतिया को रानी ने सुंदर सी मोतियों की माला पहना रखी थी। घुघुतिया जब आंगन में खेलता तो रानी मां उसे खिलाते हुए कौओं से कहती थीं। काले कौवा आरे घुघुति की माला खा ले और घुघुति जोर-जोर से ताली बजाकर खुश होता था।

घुघुतिया को खेलने के लिए रानी मां पकवान भी रखती थीं, तो कौवे आकर घुघुति के पास इक्ट्ठा हो जाते, तो वो उन्हें प्यार से पकवान खिलाता था। धीरे-धीरे घुघुति बड़ा होने लगा और कौवों से उसकी दोस्ती हो गई और वह कौवों के साथ खेलता रहता था। राजा कल्याण चंद का मंत्री बड़ा हो दुष्ट था, जब राजा नि:संतान था, तो उसे राज्य पाने की आस थी, लेकिन राजकुमार घुघुतिया के जन्म लेने से उसका सपना टूट गया था, वो मन ही मन में घुघुतिया से शत्रुता रखने लगा और एक दिन मौका पाकर वह राजकुमार घुघुति को उठाकर उसे मारने की नियत से घने जंगल की ओर ले जाने लगा।

ऐसा करते हुए कौवों ने उसे देख लिया। सभी कौवे अपने दोस्त घुघुति को बचाने के लिए मंत्री और उसके साथियों पर टूट पड़े। कुछ कौवे घुघुति की कीमती मोतियों की माला लेकर राजमहल में पहुंचकर कांव-कांव करने लगे। तभी राजा और रानी की नजर घुघुति की माला पर पड़ी, जिसे कौवा चोंच में दबाए हुए था, उसके साथी कांव-कांव कर रहे थे। राजा-रानी समझ गए कि घुघुति संकट में है।

राजा ने अपने सैनिकों को लेकर जंगल में जाकर घुघुति को बचाया और उस दुष्ट मंत्री को बंदी बना, उसे मृत्युदंड दिय, घुघुति की जीवन रक्षा होने और सही सलामत घर लौटने पर नगर की राजा सहित समस्त प्रजा बहुत प्रसन्न हुई तथा राजा के आदेश पर नगर में उत्सव का माहौल बन गया। कौओं के सम्मान में सभी नगरवासियों ने घुघुते सहित तरह-तरह के पकवान बनाकर कौवों के साथ-साथ एक दूसरे को भी खिलाए और गीत संगीत के साथ पूरे वातावरण में हर्षोलासित होकर प्रत्येक वर्ष घुघुतिया त्योहार मनाने लगे। इस घटना का समय और उत्तरायणी का त्योहार एक समय होने के कारण घुघुतिया त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा। घुघुति अंग्रेजी अक्षर & के प्रकार का एक पकवान होता है, जो खाने में अत्यंत स्वादिष्ट होता है, जिसे बनाकर उत्तराखंडी माताएं, उन्हें एक मजबूत धागे में माला पिरोकर बच्चों को खेलने के लिए दे देती थीं। सभी बच्चे अपनी-अपनी माला लेकर दौड़ते-हंसते-कूदते अत्यंत प्रसन्न होकर कौवों को आवाज लगाते हैं। ‘काले कौवा आ ले घुघुति माला खा ले’, ‘काले कौवा आले घुघुति माला खा ले’।  

उत्तरायणी कैथीग

उत्तराखंड में जिला बागेश्वर के अलावा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तथा बरेली में भी प्रति वर्ष उत्तरायणी का त्योहार बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। राजधानी लखनऊ में विभिन्न पर्वतीय प्रवासी संगठन धूमधाम से उत्तरायणी का त्योहार मनाते हैं। पर्वतीय महापरिषद के द्वारा इस अवसर पर महानगर रामलीला ग्राउंड से लेकर न्यू हैदराबाद स्थित गोमती तट के किनारे भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत सांस्कृतिक उपवन तक भव्य शोभा यात्रा के साथ दस दिवसीय ‘उत्तरायणी कैथीग’ का भी आयोजन किया जाता है।  

इस वर्ष संस्था के रजत जयंती वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में ‘उत्तरायणी कैथीग’ ‘15 दिवसीय’ कर दिया गया है। यह कौथीग (मेला) 14 जनवरी से 28 जनवरी 2026 तक चलेगा। इस मेले उत्तराखंडी जड़ी बूटियों, खान-पान, पहनावे, हस्तशिल्प, ज्वेलरी, दन, शाक-सब्जी में मूली, गडेरी इत्यादि के स्टॉल लगते हैं तथा उत्तराखंडी लोकसंस्कृति को दर्शाने वाले कार्यक्रम लोकनृत्य लोकगीतों की धूम रहती है। बड़े-बड़े गणमान्य अतिथियों के साथ साथ आम प्रवासी उत्तराखंडी बंधु भी इस कार्यक्रम में बड़े ही उत्साह से भाग लेते हैं। उत्तरायणी के इस मेले से स्थानीय लोगों में पर्वतीय संस्कृति के प्रति जिज्ञासा और अनुराग बढ़ा है, जिससे भारी संख्या में स्थानीय निवासी भी उत्तराखंडी कार्यक्रमों में जुटते हैं तथा भाग भी लेते हैं।