संपादकीय:विफलता और प्रश्न
पीएसएलवी-सी 62 मिशन मई 2025 में प्रक्षेपित पीएसएलवी-सी 61 मिशन की तरह ही असफल हो गया। इसरो की विगत उपलब्धियों और पीएसएलवी की 90 फीसद से ज्यादा सफलता के मद्देनजर शक नहीं कि इसरो अपनी गलती सुधार कर भविष्य में ऐसे मिशन में कामयाब रहेगा। 64 प्रक्षेपणों में पांच विफलताएं बुरा प्रदर्शन नहीं। पीएसएलवी ने ही चंद्रयान-1 और आदित्य-एल 1 सौर वेधशाला जैसे मिशनों को प्रक्षेपित किया था।
पर इस मिशन की नाकामी ने इसरो की प्रतिष्ठा, पीएसएलवी की क्षमताओं पर सवाल खड़ा किया है। अंतरिक्ष बाजार में तेजी से उभरते भारत की गति प्रगति को तात्कालिक तौर पर ही सही, झटका तो लगा है। इस विफलता के वित्तीय परिणाम शोचनीय हैं। प्रतिस्पर्धी वैश्विक प्रक्षेपण बाजार में इसरो पीएसएलवी को एक वाणिज्यिक उत्पाद के तौर पर प्रस्तुत करता है। यह ईओएस-ए 1 प्रेक्षण उपग्रह अन्वेषा के साथ सात देशों के स्टार्टअप्स के अलावा शैक्षणिक संस्थानों की ओर से विकसित 15 अन्य पेलोड लेकर जा रहा था, सभी नष्ट हो गए। स्वदेशी संस्थाओं की बात दीगर है, लेकिन विदेशी संस्थाओं का भरोसा इस दोहरी असफलता से किंचित डिगेगा। ऐसे में अंतरिक्ष बाजार की अंतर्राष्ट्रीय बीमा कंपनियां पीएसएलवी के जोखिम का आकलन कर प्रीमियम बहुत ज्यादा बढ़ाएंगी, इसरो का प्रक्षेपण किफायती नहीं रहेगा।
चार चरणों वाले रॉकेट पीएसएलवी-सी 62 पहले और दूसरे चरण में सामान्य रहा। तीसरे चरण के दौरान रॉकेट नियत प्रक्षेप पथ से हट गया। वह असामान्य रूप से घूमने लगा, जिसे “रोल रेट डिस्टर्बेंस” कहते हैं, इसके बाद वह अपेक्षित मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सका। संभवत: सी 61 मिशन के तीसरे चरण की तरह उसने भी ‘चैंबर प्रेशर’ खो दिया। नोजल या केसिंग प्रणाली में किसी संरचनात्मक या सामग्री संबंधी विफलता भी इसकी वजह हो सकती है। नाकामी का कारण अभी स्पष्ट नहीं है, जांच जारी है।
पिछले साल की विफलता की वजहें सार्वजनिक नहीं की गईं, फेल्योर एनालिसिस कमिटी की रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय में रखा रह गया। संभवत: रक्षा सुरक्षा मामलों को लेकर गोपनीयता बरती गई हो, ऐसे में इस बार भी उम्मीद कम ही है कि गलतियों की रिपोर्ट सामने आए। कुछ बरसों से नाकामी के विश्लेषण वाली रिपोर्टों को सार्वजनिक करना बंद है। रिपोर्ट सार्वजनिक होती तो पता चलता कि क्या कमियां थीं, उन्हें ठीक करने के लिए क्या किया गया? इस बार बस भरोसा दिलाया गया कि तीसरे चरण के डिजाइन को सुदृढ़ किया गया है, लेकिन नाकामी ही हाथ आई।
करदाता जनता और वाणिज्यिक हितधारकों को यह जानने का पूरा हक है कि 2025 में क्या गलत हुआ था? क्या 2026 में भी ऐसी ही गलती दोहराई गई और तीसरा चरण फिर से क्यों प्रभावित हुआ? निजी उद्योगों के लिए अंतरिक्ष निर्माण क्षेत्र खोलने की भारत की पहल पर भी प्रश्न है। ये कभी-कभार होने वाली गड़बड़ियां नहीं है। फिलहाल, इसरो के लिए भरोसा फिर से कायम करने और गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाले नियमों एवं प्रक्रियाओं को दोबारा बनाने का मुश्किल काम शुरू कर देना चाहिए, जिसका सबसे अच्छा तरीका तो यही होगा कि अंतरिक्ष विभाग सी 61 मिशन की “फेलियर एनालिसिस कमेटी” द्वारा दी गई रिपोर्ट को जारी करे, जिससे विफलता का सटीक कारण जानकर सबक लिया जा सके।
