लौह-इस्पात उद्योग में छिलके से बायोचार: एक टिकाऊ विकल्प बनेगा हरा नारियल, 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य  

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Published By Anjali Singh
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वाराणसी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी-बीएचयू), वाराणसी के धातुकर्म अभियांत्रिकी विभाग के प्रो. गिरिजा शंकर महोबिया एवं उनकी टीम (डॉ. विश्वजीत मिश्रा, रेहान सचान और डॉ. एल.एस. राव) ने हरे नारियल के छिलके से बने बायोचार को लौह निर्माण प्रक्रियाओं में अपचायक के रूप में उपयोग करने की संभावनाओं का सफल परीक्षण किया है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित 'वेस्ट मैनेजमेंट' जर्नल में प्रकाशित हुआ है। 

इस शोध का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इस्पात उद्योग विश्व स्तर पर कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 7 प्रतिशत और भारत में 12 प्रतिशत तक योगदान देता है। भारत ने 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन और 2030 तक 20 प्रतिशत उत्सर्जन कटौती का संकल्प लिया है। ऐसे में जीवाश्म ईंधन के स्थान पर स्थानीय एवं नवीकरणीय बायोमास-आधारित अपचायकों का उपयोग इस लक्ष्य की दिशा में एक ठोस कदम साबित हो सकता है। 

भारत दुनिया का सबसे बड़ा नारियल उत्पादक देश है। वर्ष 2021-22 में यहां 19,247 मिलियन नारियल का उत्पादन हुआ था। इससे बड़ी मात्रा में अपशिष्ट (छिलके व भूसी) उत्पन्न होता है, जिसका अब तक पर्याप्त औद्योगिक उपयोग नहीं हो पाया था। प्रो. महोबिया की टीम ने पाया कि ग्रीन कोकोनट हस्क बायोचार (जीसीएचबी या जीसीबी) पारंपरिक नॉन-कोकिंग कोयले के समान अपचयन क्षमता प्रदर्शित करता है। प्रारंभिक 60 मिनट में इसकी अपचयन दर काफी तेज रही, जिससे प्रक्रिया की दक्षता बढ़ सकती है। 

इसमें राख और सल्फर की मात्रा कोयले की तुलना में काफी कम है, जिससे स्पंज आयरन की गुणवत्ता में सुधार तथा स्लैग निर्माण में कमी संभव है। यह पूरी तरह नवीकरणीय और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध अपशिष्ट से निर्मित है, जिससे परिवहन एवं पर्यावरणीय लागत में कमी आती है। आर्थिक दृष्टि से जीसीबी की उत्पादन लागत लगभग 10,000-16,000 रुपये प्रति टन अनुमानित है, जबकि नॉन-कोकिंग कोयला 546-3,460 रुपये प्रति टन में उपलब्ध है। 

हालांकि, जीसीबी के पर्यावरणीय लाभ, बेहतर प्रतिक्रिया दर और गुणवत्ता सुधार इसकी लागत को सार्थक ठहराते हैं। इसे पूर्ण विकल्प के बजाय कोयले के साथ मिश्रण में अपनाने से उत्सर्जन कम करने का व्यावहारिक मार्ग खुल सकता है। संस्थान के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने कहा कि आईआईटी (बीएचयू) के शोधकर्ता सतत और स्वच्छ तकनीकों पर कार्यरत हैं। 

यह अध्ययन न केवल इस्पात उद्योग के लिए एक संभावित गेम-चेंजर है, बल्कि भारत की नेट जीरो 2070 की प्रतिबद्धता को सशक्त बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। हरे नारियल के छिलकों से निर्मित बायोचार लौह एवं इस्पात उद्योग में जीवाश्म-आधारित अपचायकों के विकल्प के रूप में एक टिकाऊ, स्वच्छ और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है। इस नवाचार से इस्पात उत्पादन की कार्बन तीव्रता घटाने तथा हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में प्रगति सुनिश्चित हो सकती है। 

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