संपादकीय : चांदी की चकाचौंध 

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Published By Monis Khan
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अनुमान बताते हैं कि इस वर्ष चांदी के भाव 4 लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंचेंगे। चांदी के दाम में अभूतपूर्व तेजी अब केवल निवेश या कमोडिटी बाजार का विषय नहीं, यह देश में मध्यम वर्ग के घरेलू बजट और सामाजिक जीवन पर सीधा असर डालने वाला मुद्दा बन चुका है। जब महंगाई पहले से ही आम परिवार की क्रय-शक्ति को दबाव में रखे हुए है। 

ऐसे में चांदी की बढ़ती कीमतें हमारे लिए एक गंभीर आर्थिक और सामाजिक चुनौती बन चुकी है। चांदी के बर्तन, दीवाली और विवाह जैसे अवसरों पर उपहार, पूजा-पाठ, देवमूर्ति, अनुष्ठान और आभूषण भारतीय जीवनशैली के अभिन्न हिस्से हैं। इसलिए हमारे यहां चांदी का महत्व सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। ऐसे में चांदी का महंगा होना परंपराओं और रीति-रिवाजों को भी अतिशय महंगा बना देता है। मध्यम वर्ग, जो इन परंपराओं को निभाने के लिए सीमित बचत पर निर्भर रहता है, सबसे अधिक प्रभावित है। 

चांदी की कीमतों में इस भारी उछाल के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण हैं, उन पर हमारा हस्तक्षेप नहीं के बराबर है। वह चाहे लैटिन अमेरिकी देशों में इसकी खदानों का पुराना पड़ना और इसका उत्पादन घटना हो अथवा भू-राजनीतिक तनाव और व्यापारिक विवादों का बढ़ना। अनिश्चितता और महंगाई के माहौल में देशों व निवेशकों का चांदी का संग्रह हो या फिर चांदी की औद्योगिक मांग का वैश्विक स्तर आसमान छूना। पर्यावरण बचाने की मांग पर प्लांड माइनिंग हो अथवा ज्यादातर देशों का ग्रीन एनर्जी पर ज्यादा केंद्रित होना। यह मांग संरचनात्मक है और निकट भविष्य में घटने वाली नहीं। चूंकि चांदी अक्सर तांबे और जिंक की खुदाई के साथ सह-उत्पाद के रूप में निकलती है, इसलिए जब तक इन धातुओं का उत्पादन नहीं बढ़ेगा, चांदी की वैश्विक आपूर्ति में भी तेजी आना मुश्किल है। 

भारत की स्थिति इस संदर्भ में कुछ ज्यादा संवेदनशील है। देश में सालाना चांदी का उत्पादन करीब 800 टन है, जबकि खपत 7,000 टन से अधिक। यानी भारत दुनिया की कुल चांदी मांग का 20-25 प्रतिशत अकेले खींच लेता है और इसका बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। यह आयात निर्भरता न केवल कीमतों को अंतर्राष्ट्रीय उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनाती है, बल्कि चालू खाते के घाटे पर भी दबाव डालती है। बेशक हमें इसका समाधान घर में ही तलाशना होगा। सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने और रीसाइक्लिंग को प्रोत्साहित करने की बात कर रही है, लेकिन अब तक इसका असर सीमित दिखता है। 

पुरानी चांदी की रीसाइक्लिंग, ई-वेस्ट से रिकवरी और खनन में निजी निवेश बढ़ाने जैसे कदम अब और तेज करने होंगे। कीमतें अंतर्राष्ट्रीय भाव, डॉलर रेट, आयात शुल्क, जीएसटी और स्थानीय लागत से तय होती हैं। सरकार के पास सीमित गुंजाइश है, लेकिन आयात शुल्क या कर ढांचे में अस्थायी छूट देकर घरेलू बाजार को कुछ हद तक राहत दी जा सकती है। हालांकि दीर्घकालिक समाधान आयात निर्भरता घटाने, घरेलू उत्पादन और रीसाइक्लिंग बढ़ाने तथा उद्योगों में वैकल्पिक तकनीकों को बढ़ावा देने में ही निहित है। तभी आम आदमी के लिए चांदी की चमक बरकरार रह सकेगी अन्यथा उसकी चौंध कष्ट का कारक बनी रहेगी।