अत्याधुनिक कॉक्लियर इम्प्लांट से युवक की सुनने की शक्ति लौटी, प्रदेश में पहली बार इस तकनीक का किया गया इस्तेमाल

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Published By Muskan Dixit
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सड़क हादसे में दोनों कान हो गए थे क्षतिग्रस्त, जटिल सर्जरी के बाद दाहिने कान से सुनने लगा युवक

लखनऊ, पीजीआई, अमृत विचार : संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के डॉक्टरों ने अत्याधुनिक कॉक्लियर इम्प्लांट तकनीक का सफल उपयोग कर एक युवक की सुनने की शक्ति बहाल कर दी। यह तकनीक उत्तर प्रदेश में पहली बार प्रयोग की गई है। भीषण सड़क दुर्घटना में युवक के दोनों कान गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गए थे, जिससे उसका जीवन लगभग खामोशी में डूब गया था।

दुर्घटना में युवक का बायां कान पूरी तरह काम करना बंद कर चुका था, जबकि दाहिने कान में फ्रैक्चर के कारण सुनने की क्षमता लगभग समाप्त हो गई थी। डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि दाहिने कान की श्रवण नसें सुरक्षित हैं या नहीं। यदि नसें क्षतिग्रस्त होतीं, तो युवक के दोबारा सुन पाने की कोई संभावना नहीं रहती।

इस जटिल मामले में पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ के प्रो. रमनदीप से परामर्श लिया गया। विशेष जांचों के बाद यह स्पष्ट हुआ कि दाहिने कान की नसें अभी सक्रिय हैं। इसके बाद कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी का निर्णय लिया गया।

जटिल सर्जरी, बड़ी उपलब्धि

जनवरी के दूसरे सप्ताह में एसजीपीजीआई की न्यूरो-ऑटोलॉजी टीम ने डॉ. एम. रवि शंकर के नेतृत्व में यह जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक की। सर्जरी में ऐसे आधुनिक उपकरण का उपयोग किया गया, जो सामान्य बोलचाल की आवाज के काफी करीब सुनने में मदद करता है। बुधवार को जब डिवाइस को सक्रिय किया गया, तो युवक ने तुरंत आवाजों पर प्रतिक्रिया दी। यह क्षण डॉक्टरों और परिजनों के लिए बेहद भावुक रहा।

टीमवर्क से मिली सफलता

इस पूरी प्रक्रिया में पीजीआई चंडीगढ़ की पारुल और एसजीपीजीआई की ऑडियोलॉजी टीम की आद्या, कीर्ति और मंगल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशेषज्ञ माथुर और शिवांगी ने भी तकनीकी सहयोग दिया। डॉक्टरों के अनुसार, दुर्घटना के कारण शरीर की आंतरिक संरचना में बदलाव आ गया था, जिससे सर्जरी और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई थी, लेकिन आधुनिक तकनीक और बेहतर टीमवर्क से सफलता मिली।

अब पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू

फिलहाल युवक को विशेष रिहैबिलिटेशन प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिससे वह धीरे-धीरे विभिन्न आवाज़ों को पहचान सके और सामान्य जीवन में लौट सके। खामोशी में डूबी ज़िंदगी को फिर से आवाज़ देने वाली यह उपलब्धि चिकित्सा क्षेत्र के लिए भी एक बड़ी सफलता मानी जा रही है।

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