यूपी गैंगस्टर एक्ट और भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों में टकराव पर सुप्रीम कोर्ट ने UP सरकार से मांगा जवाब

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Published By Deepak Mishra
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नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एवं असामाजिक क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1986 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) की धारा 111 (संगठित अपराध) के बीच कथित संवैधानिक असंगति के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत आरोपित कई व्यक्तियों द्वारा दायर रिट याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई कर रही थी।

22 जनवरी को मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अमित आनंद तिवारी, सिद्धार्थ दवे, विनय नवारे, अमित कुमार और संजय कुमार पाठक ने राज्य के कानून और हाल में लागू केंद्रीय कानून के बीच संवैधानिक टकराव का मुद्दा उठाया था। याचिकाओं में यूपी गैंगस्टर एक्ट की धारा 3 (दंड), धारा 12 (विशेष न्यायालयों द्वारा मुकदमे की प्राथमिकता), धारा 14 (संपत्ति की कुर्की), धारा 15 (संपत्ति की सुपुर्दगी), धारा 16 (संपत्ति अर्जन के स्वरूप की जांच) और धारा 17 (जांच के बाद आदेश) को चुनौती दी गई है। 

इसके साथ ही उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एवं असामाजिक क्रियाकलाप (निवारण) नियम, 2021 की कुछ धाराओं-नियम 16(3), 22, 35, 37(3) और 40 को भी असंवैधानिक बताया गया है। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 300-ए का उल्लंघन करते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता अमित आनंद तिवारी ने पीठ के समक्ष कहा कि बीएनएस की धारा 111 और यूपी गैंगस्टर एक्ट एक ही विधायी क्षेत्र में आते हैं और दोनों के बीच प्रत्यक्ष तथा अपूरणीय टकराव है। 

उन्होंने तर्क दिया कि संसद ने धारा 111 को लागू करते समय संगठित अपराध और समूह आधारित आपराधिक गतिविधियों के लिए एक समग्र और पूर्ण कानूनी ढांचा बनाने का लक्ष्य रखा था, जिससे यूपी गैंगस्टर एक्ट जैसे राज्य कानून अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिस्थापित हो जाते हैं। तिवारी ने अपने तर्क के समर्थन में उच्चतम न्यायालय के फैसले फोरम फॉर कलेक्टिव अफर्ट्स (एफपीसीई) बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2021) का हवाला दिया, जिसमें न्यायालय ने रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 से टकराव के आधार पर पश्चिम बंगाल हाउसिंग इंडस्ट्री रेगुलेशन एक्ट, 2017 को निरस्त कर दिया था। 

उन्होंने बताया कि उक्त फैसले में असंगति तय करने के लिए तीन कसौटियां निर्धारित की गई थीं- पहला, दोनों कानूनों के बीच प्रत्यक्ष टकराव। दूसरा, क्या संसद ने विषय पर एक संपूर्ण और विस्तृत कानून बनाने का इरादा किया है। तीसरा, क्या दोनों कानून एक ही क्षेत्र में लागू होते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने भी राज्य कानून और बीएनएस के बीच टकराव का उल्लेख करते हुए विशेष रूप से प्रत्यक्ष असंगति की कसौटी पर जोर दिया। 

राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज और अधिवक्ता रुचिरा गोयल ने दलील दी कि असंगति का प्रश्न विस्तृत कानूनी परीक्षण की मांग करता है और इस पर अध्ययन के लिए समय मांगा। पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने की अनुमति दी और निर्देश दिया कि वह एफपीसीई फैसले में निर्धारित असंगति की कसौटियों के संदर्भ में अपना स्पष्ट पक्ष रखे।

उच्चतम न्यायालय ने यह भी संज्ञान लिया कि पिछले वर्ष न्यायालय की एक अन्य पीठ ने गोरखनाथ मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (एसएचयूएटीएस मामला) में की गई टिप्पणियों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाये गये दिशा-निर्देशों को स्वीकार किया था, जहां यूपी गैंगस्टर एक्ट के कथित दुरुपयोग को लेकर चिंता जतायी गयी थी। 

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