नाटी : हिमाचल की लोकआत्मा का लयबद्ध उत्सव
लोकायन: हिमाचल प्रदेश की लोकसंस्कृति में नाटी नृत्य केवल एक कला रूप नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन, उत्सव और परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति है। सिरमौर, कुल्लू और शिमला जिलों से जन्मा यह नृत्य आज पूरे हिमाचल की पहचान बन चुका है। नाटी को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में सबसे बड़े लोक नृत्य के रूप में दर्ज किया जाना इसकी लोकप्रियता और सामूहिकता का प्रमाण है। पर्व-त्योहारों, मेलों और धार्मिक आयोजनों मंि जब सैकड़ों लोग एक साथ ताल में कदम बढ़ाते हैं, तो हिमाचल की सांस्कृतिक आत्मा सजीव हो उठती है।
नाटी की लोकप्रियता राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं रही। चंडीगढ़ जैसे शहरी क्षेत्रों में हिमाचली युवा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से इसे नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं। वहीं उत्तराखंड के जौनसारी समुदाय में भी नाटी की परंपरा इसकी सांस्कृतिक व्यापकता को दर्शाती है।
हिमाचल प्रदेश में नाटी की अनेक शैलियां प्रचलित हैं, जिनमें महासुवी, सिरमौरी, लाहौली और किन्नौरी नाटी प्रमुख हैं। किन्नौरी नाटी विशेष रूप से मूक अभिनय जैसी होती है, जिसमें नर्तक धीमी गति और सूक्ष्म भाव-भंगिमाओं के माध्यम से कथा कहते हैं। नाटी नृत्यों में ‘लोसर शोने चुकसोम’ का विशेष महत्व है, जिसका संबंध लोसाई यानी नव वर्ष से है। इस नृत्य में फसल बोने, काटने और ग्रामीण जीवन की गतिविधियों का सजीव चित्रण किया जाता है।
कुल्लू की नाटी अपने धार्मिक और नाटकीय पक्ष के लिए जानी जाती है। इसमें भगवान कृष्ण, गोपियों की रासलीला और चंद्रावली से जुड़े प्रसंगों को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। नर्तक एक-दूसरे के हाथ थामकर संगीत और ताल के अनुसार सामूहिक गति करते हैं। नाटी की लगभग तेरह शैलियां मानी जाती हैं। पहले यह नृत्य मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा किया जाता था, जो पारंपरिक टोपी, चूड़ीदार पजामा और लहराते कुर्ते पहनते थे, लेकिन समय के साथ इसमें महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है।
नाटी किसी भी आयु वर्ग के लिए खुला नृत्य है। यह पेशेवर मंच से अधिक सामूहिक आनंद और सहभागिता का प्रतीक है। यह नृत्य तीन से चार दिनों तक सुबह और रात्रि दोनों समय किया जाता है। मूलतः लास्य शैली का यह नृत्य धीमी गति और सौम्यता के लिए जाना जाता है। पारंपरिक वेशभूषा, सजावटी पंखा, रंगीन रुमाल और नरसिंघा, करनाल, शहनाई, ढोल व नगाड़े की धुनों के साथ जब नाटी का जुलूस आगे बढ़ता है, तो यह केवल नृत्य नहीं रहता, वह हिमाचल की जीवित सांस्कृतिक विरासत बन जाता है।
