आरटीआई से वैवाहिक जीवन का लेखा-जोखा नहीं मांगा जा सकता : UP सूचना आयोग

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Edited By Amrit Vichar
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग ने यह स्पष्ट किया है कि आरटीआई (सूचना का अधिकार) अधिनियम के जरिये वैवाहिक जीवन का लेखा-जोखा नहीं मांगा जा सकता है। सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के अंतर्गत दायर एक याचिका में राज्य सूचना आयुक्त मोहम्मद नदीम की पीठ ने स्पष्ट किया है कि आरटीआई का इस्तेमाल निजी वैवाहिक संबंधों की जांच-पड़ताल के लिए नहीं किया जा सकता। 

एक आधिकारिक बयान के मुताबिक पीठ ने यह व्यवस्था संत कबीर नगर की एक महिला की ओर से दायर अपील को निस्तारित करते हुए दी। पति के साथ अलगाव के बाद महिला द्वारा आरटीआई के तहत आवेदन प्रस्तुत करते हुए जानना चाहा था कि क्या वह अपने पति के साथ विधिक पत्नी के रूप में रहती है या नहीं? यदि नहीं तो उसके वैवाहिक संबंधों के बारे में ग्राम प्रधान को क्या जानकारी है? और क्या उसके पति ने अपनी विधिक पत्नी को बिना तलाक दिए बिना दूसरी महिला को पत्नी के रूप में रखा है तथा उससे उत्पन्न बच्चों का नाम व उम्र क्या है? 

जन सूचना अधिकारी ने इस पर यह उत्तर दिया कि ऐसी कोई सूचना ग्राम पंचायत के अभिलेखों में धारित नहीं करती। आवेदिका इस उत्तर से सहमत नहीं हुई और उसके द्वारा सूचना आयोग के समक्ष अपील दायर की गई। आयोग ने स्पष्ट किया कि ग्राम पंचायत से यह अपेक्षा करना कि वह नागरिकों के वैवाहिक जीवन, निजी संबंधों अथवा पारिवारिक विवादों का रिकॉर्ड रखे, आरटीआई अधिनियम की भावना का अनावश्यक विस्तार है। सूचना आयुक्त ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि " आरटीआई अधिनियम पारदर्शिता का माध्यम है, न कि स्त्री-पुरुष के निजी रिश्तों का सामाजिक रजिस्टर।" 

आयोग ने यह भी कहा कि आरटीआई के प्रति नागरिकों का भरोसा बढ़ना सकारात्मक है, किंतु यह भरोसा इस स्तर तक नहीं जाना चाहिए कि उससे यह अपेक्षा की जाए कि वह जो अस्तित्व में ही नहीं है, उसे भी उपलब्ध करा दे। पीठ ने कहा कि आरटीआई आवेदन पर जनसूचना अधिकारी ने जो सूचना उपलब्ध कराई है, वो पर्याप्त है, ऐसी अपील को निस्तारित किया जाता है।  

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