फर्स्ट राइड: स्टेयरिंग के पीछे मेरा आत्मविश्वास
जब मैंने पहली बार कार की चाबी हाथ में ली, तो वह सिर्फ एक वाहन की चाबी नहीं थी, बल्कि जिम्मेदारियों का पूरा गुच्छा था। मैं एकल परिवार में रहती हूं और मेरे पति का काम ऐसा है कि उन्हें ज्यादातर समय शहर से बाहर रहना पड़ता है। ऐसे में घर, बच्चे, स्कूल, बाजार और जिंदगी की छोटी-बड़ी जरूरतें- सब कुछ मेरे कंधों पर आ जाता है। पहले यह सब ऑटो, टैक्सी या पड़ोसियों की मदद से चलता था, लेकिन हर बार किसी पर निर्भर रहना मन को कचोटता था। एक दिन स्कूल से फोन आया- बच्चे की तबीयत अचानक खराब हो गई थी। उस दिन मुझे सबसे ज्यादा अपनी असहायता का एहसास हुआ। उसी शाम मैंने तय कर लिया कि अब कार चलाना सीखना कोई शौक नहीं, जरूरत है।
अगले ही हफ्ते ड्राइविंग स्कूल जॉइन किया। पहले दिन स्टेयरिंग पकड़ते हुए हाथ कांप रहे थे। एक्सेलेरेटर और ब्रेक के बीच का संतुलन जैसे जीवन के संतुलन की परीक्षा ले रहा था। इंस्ट्रक्टर की आवाज, पीछे से आते हॉर्न और मन के भीतर का डर सब मिलकर मुझे कई बार रुकने को मजबूर करते रहे, पर हर रुकावट के बाद एक नई हिम्मत भी पैदा होती थी। बच्चों की स्कूल बस पकड़वाने की जल्दी, सब्जी मंडी के भारी थैले और देर रात तक जागते हुए पति की आवाज़ फोन पर ये सब मुझे आगे बढ़ाते रहे।
कुछ दिनों बाद डर धीरे-धीरे आत्मविश्वास में बदलने लगा। पहली बार जब मैं अकेले बच्चों को स्कूल छोड़कर लौटी, तो लगा जैसे मैंने कोई बड़ी जीत हासिल कर ली हो। धीरे-धीरे सड़कें मुझे डराने के बजाय परिचित लगने लगीं। ट्रैफिक सिग्नल, यू-टर्न और तंग गलियां अब चुनौती नहीं रहीं। बच्चों की आंखों में भी गर्व झलकने लगा- “मम्मी अब खुद गाड़ी चलाती हैं।” यह एक छोटा सा वाक्य मेरे लिए बड़ी उपलब्धि बन गया।
कार चलाना मेरे लिए सिर्फ एक कौशल नहीं रहा, यह मेरी आज़ादी का प्रतीक बन गया। अब जरूरत पड़ने पर किसी को फोन नहीं करना पड़ता, किसी एहसान का बोझ नहीं रहता। बारिश हो या धूप, समय पर अस्पताल पहुंचना हो या अचानक कोई जरूरी काम-स्टेयरिंग के पीछे बैठते ही मुझे अपने फैसलों पर भरोसा होने लगा। आज जब मैं सड़क पर कार चलाती हूं, तो मुझे लगता है कि मैंने सिर्फ गाड़ी नहीं सीखी, मैंने खुद पर विश्वास करना सीखा है। यह अनुभव मुझे हर दिन याद दिलाता है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, अगर हौसला हो तो रास्ते खुद बन जाते हैं।-नीलम, कानपुर
